Sonam Wangchuk Case : माय लॉर्ड, गांधीजी से तुलना न करें, कल की हेडलाइन बन जाएगी जानें सुप्रीम कोर्ट में क्यों ऐसा बोले तुषार मेहता

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News India Live, Digital Desk : लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और छठी अनुसूची (6th Schedule) में शामिल करने की मांग को लेकर दिल्ली के लद्दाख भवन में विरोध प्रदर्शन कर रहे सोनम वांगचुक का मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत में है। सुनवाई के दौरान जब वांगचुक के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के तरीके की तुलना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से होने लगी, तो केंद्र सरकार के वकील तुषार मेहता ने तुरंत हस्तक्षेप किया।

अदालत में क्या हुआ? (The Courtroom Drama)

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि सोनम वांगचुक का अनशन और विरोध प्रदर्शन पूरी तरह से 'गांधीवादी' और अहिंसक है। वे केवल लद्दाख की चिंताओं को सरकार तक पहुँचाना चाहते हैं।

तुषार मेहता की आपत्ति: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, "माय लॉर्ड, कृपया उनकी (वांगचुक) तुलना महात्मा गांधी से न करें। यदि ऐसा कहा गया, तो कल यह अखबारों की बड़ी हेडलाइन बन जाएगी।"

दलील का आधार: मेहता का तर्क था कि गांधीजी एक अद्वितीय व्यक्तित्व थे और किसी भी समकालीन प्रदर्शनकारी की तुलना उनसे करना उचित नहीं है, चाहे वह कितना भी शांतिपूर्ण क्यों न हो।

विवाद की जड़: क्या हैं सोनम वांगचुक की मांगें?

सोनम वांगचुक और लद्दाख के लोग पिछले कई महीनों से 'पदयात्रा' और 'अनशन' कर रहे हैं। उनकी मुख्य मांगें हैं:

छठी अनुसूची: लद्दाख के संवेदनशील पर्यावरण और जनजातीय संस्कृति को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करना।

पूर्ण राज्य का दर्जा: केंद्र शासित प्रदेश के बजाय लद्दाख को एक पूर्ण राज्य बनाना ताकि वहां की जनता की अपनी चुनी हुई सरकार हो।

पर्यावरण संरक्षण: हिमालयी क्षेत्र में अनियंत्रित औद्योगिक विकास पर रोक लगाना।

सुप्रीम कोर्ट का रुख

अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार से पूछा है कि प्रदर्शनकारियों को दिल्ली के जंतर-मंतर या किसी अन्य निश्चित स्थान पर शांतिपूर्वक बैठने की अनुमति क्यों नहीं दी जा रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार सभी को है, लेकिन सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का ध्यान रखना भी जरूरी है।