Rashid Terror Funding Case : जब एक कैदी बन गया माननीय, इंजीनियर राशिद की जीत एक जीत है या एक सवाल?
News India Live, Digital Desk : 2024 के लोकसभा चुनाव में बारामूला सीट से जीत का परचम लहराने वाले इंजीनियर राशिद एक बार फिर चर्चा में हैं. आतंक को पैसा मुहैया कराने (टेरर फंडिंग) के एक गंभीर मामले में दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद राशिद को अदालत से एक बड़ी राहत मिली है. दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने उन्हें 28 जनवरी से शुरू हो रहे संसद के बजट सत्र में शामिल होने के लिए कस्टडी पैरोल दे दी है.
कैसे जाएंगे संसद?
अदालत ने यह पैरोल कुछ शर्तों के साथ दी है. इंजीनियर राशिद हर दिन पुलिस की सुरक्षा में तिहाड़ जेल से सीधे संसद भवन जाएंगे और सत्र खत्म होते ही उन्हें वापस जेल ले जाया जाएगा. यह पैरोल 28 जनवरी से 2 अप्रैल 2026 तक, यानी पूरे बजट सत्र के लिए दी गई है. इसका मतलब है कि वे एक सांसद के तौर पर अपने क्षेत्र की आवाज सदन में उठा सकेंगे.
क्यों जेल में हैं राशिद?
इंजीनियर राशिद को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने 2019 में गिरफ्तार किया था. उन पर 2017 के एक टेरर फंडिंग मामले में शामिल होने का आरोप है. NIA का कहना है कि राशिद पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, यानी UAPA के तहत मामला दर्ज है. आरोप है कि वह पाकिस्तान से होने वाली टेरर फंडिंग की साजिश का हिस्सा थे.
जेल में रहकर ही बने थे सांसद
यह मामला इसलिए भी अनोखा है क्योंकि इंजीनियर राशिद ने जेल में रहते हुए ही लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीता. उन्होंने बारामूला सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पर्चा भरा था. उनके बेटे अबरार राशिद ने उनके लिए प्रचार की कमान संभाली और जनता से अपने पिता के लिए वोट मांगे. चुनाव के नतीजे जब आए तो सब हैरान रह गए. राशिद ने जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला जैसे दिग्गज नेता को 2 लाख से भी ज्यादा वोटों के भारी अंतर से हरा दिया.
यह पहली बार नहीं है जब राशिद को पैरोल मिली है. इससे पहले भी उन्हें सांसद पद की शपथ लेने, मानसून सत्र में शामिल होने और उपराष्ट्रपति चुनाव में वोट डालने के लिए कस्टडी पैरोल दी जा चुकी है. इस फैसले के बाद एक बार फिर यह बहस छिड़ गई है कि गंभीर आरोपों में जेल में बंद किसी जनप्रतिनिधि को सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेने की इजाजत मिलनी चाहिए या नहीं