सिर्फ नसबंदी से बात नहीं बनेगी ,सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के मुद्दे पर दिया ऐसा जवाब कि चुप रह गए दिग्गज वकील
News India Live, Digital Desk: आजकल शहर हो या गांव, आवारा कुत्तों का आतंक एक ऐसी हकीकत बन चुका है जिसे नज़अंदाज़ करना नामुमकिन है। अक्सर खबरें आती हैं कि पार्क में खेल रहे बच्चे या सुबह सैर पर निकले बुजुर्ग पर आवारा कुत्तों ने हमला कर दिया। इसी बेहद गंभीर और भावनात्मक मुद्दे पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही थी, जहाँ दिग्गज वकील कपिल सिब्बल और सुप्रीम कोर्ट के जजों के बीच एक ऐसी बातचीत हुई, जिसने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
कपिल सिब्बल की 'चिंता' और वो कड़ा सुझाव
बहस के दौरान कपिल सिब्बल ने बड़े ज़ोरदार ढंग से यह बात रखी कि आवारा कुत्तों की बढ़ती तादाद अब काबू से बाहर हो रही है। उन्होंने सड़कों पर सुरक्षा का हवाला देते हुए मांग की कि आवारा कुत्तों की 'स्टेरलाइजेशन' यानी नसबंदी को अनिवार्य और तेज़ करना चाहिए। उनका तर्क साफ था— जब तक इनकी आबादी नहीं घटेगी, तब तक लोगों का सड़क पर निकलना खतरे से खाली नहीं होगा।
अदालत का वो 'मज़ेदार' मगर गहरा पलटवार
जैसे ही सिब्बल ने नसबंदी की बात छेड़ी, कोर्ट रूम का माहौल एक हल्के-फुल्के मज़क के साथ थोड़ा संजीदा भी हो गया। जजों ने सिब्बल की दलील सुनते हुए मुस्कुरा कर पलटवार किया। जज ने मज़ाक में कहा— "क्यों न इन कुत्तों की काउंसलिंग करवा दी जाए?"
हंसी के बीच छिपा यह संदेश बड़ा गहरा था। अदालत दरअसल यह इशारा कर रही थी कि केवल नसबंदी कर देना भर ही समस्या का आखिरी हल नहीं है। मामला पेचीदा है क्योंकि एक तरफ इंसानी जान है और दूसरी तरफ पशु अधिकार कार्यकर्ताओं (Animal Rights Activists) का अपना तर्क। कानून इन दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन गलियों की हकीकत कुछ और ही बयां करती है।
हम और आप किसके साथ?
जज साहब के इस मज़ाकिया सवाल ने सोशल मीडिया पर भी बहस छेड़ दी है। लोगों का कहना है कि जब एक मासूम बच्चा कुत्ते के काटने का शिकार होता है, तो वहां कोई 'काउंसलिंग' या 'नियम' याद नहीं आता। माता-पिता के मन में डर घर कर चुका है। वहीं, जो लोग कुत्तों से प्यार करते हैं, वे नसबंदी के दौरान होने वाली क्रूरता या उन्हें मारे जाने के खिलाफ़ खड़े रहते हैं।
आगे की राह क्या है?
अदालत में ऐसी बहसें यह बताती हैं कि सरकारी तंत्र आवारा कुत्तों की समस्या को सुलझाने में अब तक नाकाम रहा है। चाहे वो मुन्सिपल कॉर्पोरेशन हो या एनजीओ, आंकड़े कागज़ों पर तो बढ़ रहे हैं, लेकिन सड़कों पर खतरा कम नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट फिलहाल इस मामले में कोई बीच का रास्ता निकालने की कोशिश कर रहा है, जहाँ इंसानों को सुरक्षा मिले और बेज़ुबान जानवरों के साथ भी ज़्यादती न हो।
आपको क्या लगता है? क्या वाकई सिर्फ नसबंदी ही आवारा कुत्तों का आतंक खत्म कर सकती है या हमें किसी नए समाधान के बारे में सोचना चाहिए? हमें अपनी राय कमेंट में ज़रूर बताएं।