गंगा सबकी है या सिर्फ अपनों की? हरिद्वार अर्धकुंभ 2027 से पहले क्यों शुरू हुआ गैर-हिंदुओं के स्नान पर ये बड़ा विवाद
News India Live, Digital Desk: हम सब जानते हैं कि जब भी हरिद्वार की बात आती है, तो हमारे मन में मां गंगा के पवित्र तटों और शाम की भव्य आरती की तस्वीर उभर आती है। हर साल लाखों-करोड़ों लोग यहाँ श्रद्धा के साथ सिर झुकाने आते हैं। लेकिन साल 2027 में होने वाले हरिद्वार अर्धकुंभ मेले से पहले एक ऐसी मांग उठी है, जिसने सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है।
विश्व हिंदू परिषद (VHP) के नेताओं ने एक सख्त प्रस्ताव सामने रखा है कि हरिद्वार के पवित्र गंगा घाटों पर गैर-हिंदुओं के स्नान करने या वहां आने पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।
आखिर वीएचपी ने यह मांग क्यों उठाई?
अक्सर देखा जाता है कि कुंभ जैसे बड़े आयोजनों में सुरक्षा और शुचिता (पवित्रता) का सवाल सबसे ऊपर होता है। वीएचपी नेताओं का तर्क है कि हरिद्वार और विशेषकर 'हर की पैड़ी' जैसे घाटों की एक अपनी धार्मिक मर्यादा है। उनके मुताबिक, जो लोग हिंदू धर्म या सनातन पद्धति में विश्वास नहीं रखते, उनके लिए ये जगह सिर्फ एक पर्यटन स्थल बनकर रह जाती है, जिससे वहां की आस्था को चोट पहुँच सकती है।
नेताओं ने इस बात पर भी जोर दिया है कि अर्धकुंभ मेले के दौरान भारी भीड़ होती है। ऐसे में कई बार 'साजिशों' या आपसी विवादों की खबरें आती हैं। इसी सुरक्षा चक्र को मजबूत करने और घाटों की सनातन गरिमा को बनाए रखने के लिए यह प्रस्ताव दिया गया है कि गैर-सनातनी लोगों को घाटों से दूर रखा जाए।
पुरानी रार और मौजूदा हालात
यह कोई पहली बार नहीं है जब ऐसा कुछ कहा गया हो। हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे क्षेत्रों को 'तीर्थ क्षेत्र' घोषित करने के बाद से ही वहां खान-पान और व्यापार को लेकर भी कड़े नियम बनाने की मांग होती रही है। हाल के दिनों में कई संतों और हिंदू संगठनों ने खुले तौर पर कहा है कि यदि गंगा के तटों पर श्रद्धा के साथ नहीं, बल्कि 'घूमने' के मकसद से कोई आता है और वहां का माहौल खराब करता है, तो उसे अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
क्या होगा इसका असर?
प्रशासन के लिए यह किसी 'धर्मसंकट' से कम नहीं है। एक तरफ जहां धार्मिक भावनाओं का सम्मान जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ पर्यटन और सभी की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी सरकार की जिम्मेदारी है। अगर प्रशासन वीएचपी की इस मांग को किसी रूप में स्वीकार करता है, तो उसे अर्धकुंभ मेले के दौरान भारी संख्या में तैनात पुलिस और पहचान पत्र की जांच (Identification checks) का सहारा लेना पड़ सकता है।
हमारी नजर में...
अर्धकुंभ कोई सामान्य आयोजन नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आत्मा से जुड़ा मामला है। जहाँ सुरक्षा ज़रूरी है, वहीं धार्मिक शांति को बनाए रखना भी प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। क्या किसी की आस्था पर प्रतिबंध लगाना इसका सही समाधान है या कुछ और सख्त नियम बनाने की ज़रूरत है? यह एक ऐसा सवाल है जो आने वाले महीनों में और भी गरमाने वाला है।
आप इस मांग को कैसे देखते हैं? क्या आपको लगता है कि हरिद्वार जैसे तीर्थ स्थलों की मर्यादा को बनाए रखने के लिए ऐसे प्रतिबंध ज़रूरी हैं? अपनी राय हमें कमेंट में ज़रूर बताएं।