Mission 2027: अखिलेश यादव का '11 महीने पहले' वाला मास्टरप्लान; यूपी की सत्ता वापसी के लिए फूंका चुनावी बिगुल

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है, लेकिन समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव 'इलेक्शन मोड' में आ चुके हैं। जानकारों का मानना है कि अखिलेश ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए इस बार चुनाव के ठीक पहले के बजाय, काफी पहले ही उम्मीदवारों और मुद्दों को तय करने का मन बनाया है।

अखिलेश यादव का यह 'मिशन-27' न केवल बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती है, बल्कि यह सपा के कार्यकर्ताओं में नया जोश भरने की एक सोची-समझी कोशिश भी है।

अखिलेश के 'मेगा प्लान' की 5 बड़ी बातें:

28 मार्च से 'जनसंपर्क अभियान' का आगाज: खबरों के मुताबिक, अखिलेश यादव 28 मार्च 2026 से पूरे प्रदेश में सघन चुनाव प्रचार अभियान शुरू करने जा रहे हैं। यह अभियान उन क्षेत्रों को टारगेट करेगा जहां बीजेपी का दबदबा रहा है।

PDA का नया समीकरण: 'पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक' (PDA) के नारे को और धार देते हुए अखिलेश अब सामान्य सीटों पर भी दलित उम्मीदवार उतारने की तैयारी में हैं। इससे वे सामाजिक न्याय का एक बड़ा संदेश देना चाहते हैं।

उम्मीदवारों का एडवांस चयन: अखिलेश यादव ने संकेत दिए हैं कि कई सीटों पर उम्मीदवारों के नाम 6 से 11 महीने पहले ही घोषित किए जा सकते हैं। 'A' कैटेगरी वाली (मजबूत) सीटों पर प्रत्याशियों के पैनल लगभग तैयार कर लिए गए हैं।

महिलाओं के लिए बड़े वादे: 'स्त्री सम्मान समृद्धि योजना' के तहत अखिलेश ने वादा किया है कि सरकार बनने पर महिलाओं के खाते में सीधे कैश ट्रांसफर किया जाएगा, साथ ही छात्राओं को फ्री लैपटॉप और मोबाइल देने की योजना भी उनके मेनिफेस्टो का हिस्सा है।

सांसदों को 'रिपोर्ट कार्ड' की जिम्मेदारी: हाल ही में लखनऊ में हुई बड़ी बैठक में अखिलेश ने सभी सांसदों को उनके संसदीय क्षेत्रों के तहत आने वाली हर विधानसभा सीट की ग्राउंड रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया है।

क्यों इतनी जल्दी चुनावी मैदान में उतरे अखिलेश?

सियासी गलियारों में चर्चा है कि सपा प्रमुख बीते एक दशक के रिकॉर्ड को दोहराना नहीं चाहते, जहां ऐन वक्त पर गठबंधन या टिकट बंटवारे में देरी से पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा था।

संगठन की मजबूती: अखिलेश का लक्ष्य चुनाव से 11 महीने पहले ही बूथ स्तर पर संगठन को इतना मजबूत करना है कि बीजेपी की चुनावी मशीनरी का मुकाबला किया जा सके।

एंटी-इंकम्बेंसी का लाभ: वे समय से पहले मैदान में उतरकर जनता के बीच सरकार विरोधी मुद्दों (बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक) को हवा देना चाहते हैं।