Mauni Amavasya : जब बोलना मना हो, तो भगवान तक अपनी बात कैसे पहुंचाएं? जानिए सही तरीका
News India Live, Digital Desk : हम और आप, अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इतना उलझे हुए हैं कि शायद ही कभी खुद के लिए वक्त निकाल पाते हैं। सुबह से शाम तक मोबाइल की घंटी, ट्रैफिक का शोर और काम की भागदौड़। हमारे धर्म और संस्कृति में कुछ दिन ऐसे बनाए गए हैं, जो हमें इस शोरगुल से दूर ले जाते हैं। इन्ही में से एक सबसे खास दिन है मौनी अमावस्या (Mauni Amavasya)।
माघ के महीने में आने वाली यह अमावस्या सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि अपने मन को डिटॉक्स (Detox) करने का, या यूँ कहें कि "मन के स्नान" का पर्व है। आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि इस बार आपको क्या करना चाहिए और पीपल के पेड़ का इस दिन क्या महत्व है।
'मौन' रहने का मतलब क्या है?
'मौनी' शब्द बना है 'मुनि' से। मतलब, ऋषि-मुनियों जैसा आचरण करना। हम अक्सर सोचते हैं कि मौन व्रत का मतलब सिर्फ मुंह बंद रखना है। लेकिन असल में, इसका मतलब है मन का शांत होना। अगर आप मुंह से तो कुछ नहीं बोल रहे, लेकिन मन में किसी को गालियां दे रहे हैं या बुरा सोच रहे हैं, तो वो व्रत नहीं कहलाएगा।
कोशिश करें कि इस दिन जितना हो सके कम बोलें। अगर पूरा दिन चुप रहना संभव नहीं है, तो कम से कम नहाने तक या पूजा खत्म होने तक तो 'साइलेंस मोड' में रहें। यकीन मानिए, यह चुप्पी आपको मानसिक रूप से बहुत ताकतवर महसूस कराएगी।
पीपल के पेड़ की परिक्रमा का राज
हमारे बुजुर्ग हमेशा कहते आए हैं कि पीपल के पेड़ में देवी-देवताओं का वास होता है। विज्ञान भी मानता है कि पीपल सबसे ज्यादा ऑक्सीजन देता है। मौनी अमावस्या के दिन पीपल की पूजा का बहुत गहरा महत्व है।
कहा जाता है कि इस दिन सुबह स्नान करने के बाद, पीपल के पेड़ की जड़ में जल, दूध या थोड़ा सा तिल मिलाकर चढ़ाना चाहिए। इसके बाद, अगर आप पीपल के तने के चारों ओर 108 बार परिक्रमा (चक्कर) लगाते हैं और साथ में ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जाप करते हैं (भले ही मन में करें), तो जीवन की बड़ी-बड़ी परेशानियां छोटी लगने लगती हैं। यह उपाय उन लोगों के लिए रामबाण माना गया है जो मानसिक तनाव या पितृ दोष से परेशान हैं।
व्रत की छोटी सी कहानी (जो आस्था जगा दे)
वैसे तो मौनी अमावस्या से जुड़ी कई कहानियां हैं, लेकिन सबका सार एक ही है तपस्या और पवित्रता। पुरानी कथाओं में बताया गया है कि कैसे एक बार पूरी दुनिया का शोर थम गया था और सिर्फ पवित्र नदियों के जल ने पापों को धोया था। कांची पुरी की एक ब्राह्मणी और सोमा धोबिन की कहानी भी काफी प्रचलित है, जहाँ सच्चे मन से किए गए पुण्य के दान ने मरे हुए पति को भी जीवित कर दिया था। यह दिन हमें याद दिलाता है कि आपके कर्म और आपकी वाणी (या मौन) में कितनी ताकत होती है।
स्नान का महत्त्व
अगर आप गंगा जी या किसी पवित्र नदी तक नहीं जा सकते, तो निराश न हों। बाल्टी भर पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाएं और मन में मां गंगा का ध्यान करें। आस्था हो, तो घर का नल भी गंगा है।
तो इस बार, मौनी अमावस्या पर, बाहरी शोर को बंद करें और अपने भीतर की आवाज सुनें। शायद आपको वो जवाब मिल जाए, जो आप बाहर ढूंढ रहे थे।