गौरी लंकेश हत्याकांड से जुड़ा नाम अब बनेगा पार्षद, श्रीकांत पांगारकर की जीत के बाद गरमाई महाराष्ट्र की सियासत

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News India Live, Digital Desk: महाराष्ट्र की राजनीति में समय-समय पर ऐसे मोड़ आते हैं जो न केवल राज्य बल्कि पूरे देश में चर्चा का विषय बन जाते हैं। इस बार सुर्खियों में है जालना नगर निगम चुनाव का एक नतीजा। चुनावी मैदान में बहुत से उम्मीदवार थे, लेकिन सबकी निगाहें टिकी थीं श्रीकांत पांगारकर पर। वजह? पांगारकर का नाम चर्चित पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के मामले से जुड़ा रहा है।

अब ताज़ा अपडेट यह है कि श्रीकांत पांगारकर ने अपनी सीट से जीत दर्ज कर ली है और वे पार्षद चुन लिए गए हैं। चलिए, बहुत ही सरल अंदाज़ में समझते हैं कि ये मामला क्या है और इसे लेकर इतना शोर क्यों मच रहा है।

कौन हैं श्रीकांत पांगारकर और क्यों था उन पर विवाद?
श्रीकांत पांगारकर का पुराना नाता राजनीति से रहा है, लेकिन उनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर तब उछला जब उन्हें पत्रकार गौरी लंकेश मर्डर केस में गिरफ्तार किया गया। उन पर हत्या की साज़िश और हथियार मुहैया कराने जैसे गंभीर आरोप लगे थे। वे काफी समय जेल में भी रहे। हालांकि, कुछ समय पहले उन्हें जमानत (Bail) मिल गई और वे वापस बाहर आ गए। बाहर आते ही उन्होंने एक बार फिर सक्रिय राजनीति में कदम रखा, जिसने काफी विवाद पैदा कर दिया था।

जालना की जीत और सियासी गणित
श्रीकांत पांगारकर को चुनावी मैदान में उतारना ही विपक्ष के लिए बड़ा मुद्दा था। विपक्ष का कहना था कि ऐसे संगीन आरोपों वाले व्यक्ति को चुनाव नहीं लड़ना चाहिए। लेकिन पांगारकर ने न केवल चुनाव लड़ा, बल्कि जीत हासिल करके यह साबित कर दिया कि स्थानीय स्तर पर उनका प्रभाव अब भी बरकरार है। उनके समर्थकों ने उनकी इस जीत को 'न्याय' की शुरुआत बताया है, वहीं आलोचक इसे राजनीति के 'अपराधीकरण' का हिस्सा मान रहे हैं।

लोकतंत्र और जनमत का संदेश
चुनावों में सबसे बड़ी ताकत जनता का वोट होता है। पांगारकर की जीत ने यह बहस छेड़ दी है कि क्या जनता केवल विकास और वादों पर वोट देती है या फिर वो आरोपी के अतीत को नजरअंदाज करने के लिए भी तैयार रहती है? महाराष्ट्र की राजनीति में पहले ही बहुत उथल-पुथल चल रही है, ऐसे में पांगारकर का पार्षद बनना शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) और अन्य दलों के लिए अलग-अलग तरह के सियासी समीकरण खड़ा कर सकता है।

हमारी राय
कानून की लड़ाई अभी लंबी है। गौरी लंकेश मर्डर केस के तार काफी पेचीदा हैं और मामला कोर्ट में विचाराधीन है। लेकिन राजनीति का मंच अब उन्हें एक 'जन-प्रतिनिधि' के रूप में स्वीकार कर चुका है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि नगर निगम की बैठकों में पांगारकर की भूमिका क्या रहती है और इस जीत का उनके मुख्य केस पर क्या कोई सामाजिक या राजनीतिक असर पड़ता है?

क्या आपको लगता है कि किसी गंभीर आरोप में जेल से बाहर आए व्यक्ति को चुनाव लड़ने की अनुमति होनी चाहिए? या जनता का फैसला ही सर्वोपरि है? अपनी बात कमेंट्स में हमारे साथ साझा करें।