Lohri 2026 : क्या आपको पता है कौन थे दुल्ला भट्टी जिनके बिना अधूरी है हर पंजाबी की लोहड़ी? जानिए सही तारीख
News India Live, Digital Desk: जनवरी का आधा महीना बीतते ही उत्तर भारत की हवाओं में एक खास किस्म की मिठास और खुशबू घुलने लगती है मूंगफली, गज्जक और आग के जलने की खुशबू। लोहड़ी पंजाबियों का ही नहीं, बल्कि अब पूरे देश का पसंदीदा त्योहार बन चुका है। लेकिन साल 2026 में लोहड़ी की तारीख को लेकर अगर आप उलझन में हैं, तो सबसे पहले वो जान लेते हैं।
तारीख का हिसाब: कब मनाई जाएगी लोहड़ी?
परंपरा के अनुसार, लोहड़ी मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले मनाई जाती है। साल 2026 में मकर संक्रांति 14 जनवरी की है, इसलिए लोहड़ी का जश्न 13 जनवरी 2026 (मंगलवार) की शाम को मनाया जाएगा। यह कड़ाके की ठंड में सूरज के उत्तरायण होने की खुशी और फसल कटने का त्योहार है।
वो कहानी जिसके बिना हर गाना अधूरा है: 'सुंदर मुंदरिये' का राज
हम सबने बचपन से लोहड़ी की आग के चारों तरफ घूमते हुए एक गाना ज़रूर सुना और गाया है "सुंदर मुंदरिये हो! तेरा कौन बेचारा हो! दुल्ला भट्टी वाला हो!"
लेकिन कौन था ये दुल्ला भट्टी? क्यों उसे याद करना इतना ज़रूरी है? दरअसल, दुल्ला भट्टी मुग़ल सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान पंजाब के एक लोक-नायक (Robin Hood) थे। उनकी सबसे मशहूर कहानी दो अनाथ लड़कियों, 'सुंदर' और 'मुंदर' से जुड़ी है।
कहा जाता है कि एक ज़मींदार उन दो गरीब लड़कियों को जबरन ले जाकर गुलामी के बाज़ार में बेचना चाहता था। जब यह खबर दुल्ला भट्टी तक पहुंची, तो उन्होंने न सिर्फ उन लड़कियों को आज़ाद करवाया, बल्कि एक पिता की तरह जंगल में ही उनके निकाह की सारी व्यवस्था की। उनके पास कुछ देने के लिए नहीं था, तो उन्होंने जलती हुई आग के पास उन लड़कियों की झोली में सिर्फ़ एक-एक किलो शक्कर डालकर उनका कन्यादान किया।
यही वजह है कि लोहड़ी पर हम 'शक्कर' (गज्जक, रेवड़ी) और 'आग' के साथ इस दानवीर की याद मनाते हैं, जिसने अन्याय के खिलाफ खड़े होकर बेटियों का मान बढ़ाया।
आधुनिक दौर में लोहड़ी का महत्त्व
आज की भागदौड़ भरी लाइफ में लोहड़ी वह मौका है, जब लोग अपने फोन छोड़कर अपनों के साथ बैठते हैं। मूंगफली के छिलके उतारते हुए गप्पें मारना, आग में तिल डालना और ढोल की थाप पर भांगड़ा करना, यही हमारी असली पहचान है। लोहड़ी सिर्फ़ नई फसल का स्वागत नहीं है, बल्कि यह आपस में प्यार बांटने और पुरानी कड़वाहट को उसी अग्नि में भस्म कर देने का दिन है।
तो इस बार जब आप 13 जनवरी की रात को आग जलाएं, तो याद रखियेगा कि वो सिर्फ़ गर्मी पाने के लिए नहीं है, बल्कि वो प्रतीक है दुल्ला भट्टी की उस 'मशाल' का, जिसने अंधेरे में उजाला फैलाने का साहस किया था।