स्वर्ग की सुंदरी और ऋषि का भयानक क्रोध ,क्यों हज़ारों साल तक पत्थर बनकर रही अप्सरा रंभा? जानिए अनसुनी कहानी
News India Live, Digital Desk: यह कहानी उस समय की है जब महर्षि विश्वामित्र अपनी तपस्या के जरिए ब्रह्मांड में भारी शक्तियां अर्जित कर रहे थे। विश्वामित्र की घोर तपस्या को देखकर देवराज इंद्र हमेशा की तरह घबरा गए। उन्हें लगा कि अगर विश्वामित्र की तपस्या पूरी हो गई, तो वे इंद्र का सिंहासन छीन लेंगे।
इंद्र ने इस तपस्या को भंग करने के लिए अपनी सबसे बड़ी 'शतरंज की चाल' चली और अप्सरा रंभा को याद किया।
इंद्र का आदेश और रंभा की मजबूरी
इंद्र ने रंभा को आदेश दिया कि वह धरती पर जाए और अपनी सुंदरता और कामुकता से विश्वामित्र का ध्यान भटकाए। रंभा जानती थी कि महर्षि विश्वामित्र बहुत क्रोधित स्वभाव के हैं और उनके ध्यान में बाधा डालना किसी आग से खेलने जैसा है। उसने मना करने की कोशिश की, लेकिन इंद्र के कठोर आदेश के आगे उसकी एक न चली।
तपस्या में खलल और महर्षि का क्रोध
रंभा ने पृथ्वी पर आकर वसंत ऋतु जैसा माहौल बनाया और मधुर संगीत के साथ नृत्य शुरू किया। जब कोयल की कूक और घुंघरुओं की आवाज महर्षि विश्वामित्र के कानों में पड़ी, तो उनकी आँखें खुल गईं। पहले तो वे मोहित हुए, लेकिन जल्द ही उन्हें आभास हो गया कि यह सब इंद्र की चाल है ताकि उनकी वर्षों की मेहनत मिट्टी में मिल जाए।
विश्वामित्र का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने रंभा की ओर देखते हुए कहा "तूने मेरी कठिन तपस्या को दूषित करने का साहस किया है, इसलिए मैं तुझे शाप देता हूं कि तू अगले दस हजार वर्षों तक इसी वन में पत्थर की प्रतिमा बनकर खड़ी रहेगी।"
कैसे हुआ शाप का अंत?
रंभा के गिड़गिड़ाने पर महर्षि का मन थोड़ा कोमल हुआ, लेकिन शाप वापस नहीं लिया जा सकता था। उन्होंने बताया कि हजारों साल बाद जब एक तपस्वी ब्राह्मण अपनी दिव्य दृष्टि और तप के प्रभाव से उसे छुएगा, तब जाकर वह फिर से अपने असली अप्सरा रूप में आ सकेगी। कुछ कथाओं के अनुसार, वशिष्ठ ऋषि की सहायता से या कालखंड बीतने के बाद रंभा इस कष्ट से मुक्त हो सकी।
इस कहानी से क्या सीख मिलती है?
रंभा और विश्वामित्र की यह कहानी हमें बताती है कि कैसे शक्तिशाली लोगों की आपसी खींचतान (इंद्र और विश्वामित्र) के बीच अक्सर किसी मासूम को अपनी बलि देनी पड़ती है। यह कहानी अनुशासन और क्रोध के परिणामों पर भी गहरी चोट करती है।