न्याय सिर्फ़ क़ानून की किताब नहीं, CJI सूर्यकांत बोले- बदलाव और संतुलन के बिना इंसाफ अधूरा है

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News India Live, Digital Desk : हम और आप जब भी अदालत या 'न्याय' (Justice) शब्द के बारे में सोचते हैं, तो दिमाग में अक्सर लंबी तारीखें, पेचीदा कानून और एक रूखा सिस्टम आता है। लेकिन क्या न्याय सच में इतना रूखा है? भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने हाल ही में जो बातें कही हैं, वो न्यायपालिका को देखने का हमारा नजरिया बदल सकती हैं।

अक्सर हम मानते हैं कि कानून सख्त होता है और बदला नहीं जा सकता, लेकिन CJI का मानना है कि 'न्याय एक जीवंत संस्था है' (Vibrant Institution)। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि उनके कहने का मतलब क्या है और यह आम आदमी के लिए क्यों मायने रखता है।

इंसाफ: ठहरा हुआ पानी नहीं, बहती नदी जैसा है

जस्टिस सूर्यकांत ने अपने संबोधन में बहुत गहरी बात कही है। उन्होंने समझाया कि न्यायपालिका कोई ऐसी इमारत नहीं है जो बस खड़ी है और समय के साथ पुरानी हो रही है। बल्कि, यह एक ऐसी संस्था है जिसमें जान है। जैसे समाज बदलता है, लोगों की सोच बदलती है और नई तकनीक आती है, वैसे ही न्याय देने के तरीके में भी ताज़गी और बदलाव जरूरी है।

अगर हम पुराने ढर्रे पर ही चलते रहे, तो आज के दौर की चुनौतियों से नहीं निपट पाएंगे। उनका कहना साफ़ है—न्याय व्यवस्था को समय के साथ कदमताल करनी होगी।

संतुलन: सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ी ताकत

हम सब जानते हैं कि टेक्नोलॉजी अब अदालतों में भी आ गई है। वर्चुअल सुनवाई से लेकर ऑनलाइन केस फाइलिंग तक, चीजें डिजिटल हो रही हैं। लेकिन CJI ने यहां एक बहुत महत्वपूर्ण चेतावनी भी दी है—'संतुलन' यानी Balance की।

उनका इशारा इस तरफ था कि हमें आधुनिक होना है, लेकिन अपनी जड़ों को नहीं काटना है। इसका मतलब यह हुआ कि:

  1. तकनीक बनाम इंसान: टेक्नोलॉजी जरुरी है, लेकिन न्याय में 'मानवीय स्पर्श' (Human touch) कभी ख़त्म नहीं होना चाहिए। कंप्यूटर डाटा बता सकता है, लेकिन किसी की तकलीफ को सिर्फ़ एक इंसान ही महसूस कर सकता है।
  2. पुराने सिद्धांत बनाम नई सोच: हमारे कानून के कुछ बुनियादी सिद्धांत हैं जो कभी नहीं बदलेंगे, जैसे—सच्चाई और निष्पक्षता। हमें नई चीजें अपनानी हैं, पर इन बुनियादों को हिलाना नहीं है।

आम आदमी के लिए उम्मीद

CJI की इन बातों से एक आम भारतीय को काफी उम्मीद मिलती है। यह इस बात का संकेत है कि सुप्रीम कोर्ट यह समझ रहा है कि उसे जनता के लिए सुलभ और सरल होना पड़ेगा। जब देश का सबसे बड़ा जज यह कहे कि हमें 'स्थिर' नहीं रहना है बल्कि 'जीवंत' रहना है, तो इसका सीधा मतलब है कि सिस्टम में सुधार की गुंजाइश हमेशा खुली है।