आईआरएस अधिकारी निशा उरांव का तीखा हमला और आदिवासियों की संस्कृति पर छिड़ी नई बहस

आईआरएस अधिकारी निशा उरांव का तीखा हमला और आदिवासियों की संस्कृति पर छिड़ी नई बहस

भारतीय प्रशासनिक सेवा और आयकर विभाग की जानी-मानी वरिष्ठ अधिकारी निशा उरांव एक बार फिर अपने बयानों के कारण देश भर की सुर्खियों में आ चुकी हैं। इस बार उनका गुस्सा किसी प्रशासनिक लापरवाही या विभागीय मनमानी पर नहीं, बल्कि उस मानसिकता पर फूटा है जो अक्सर देश के मूलनिवासी यानी आदिवासी समाज की समृद्ध संस्कृति, परंपराओं और जीवनशैली को बिना पूरी जानकारी के तोड़-मरोड़कर पेश करती है। अपने तीखे और बेबाक अंदाज के लिए पहचानी जाने वाली आईआरएस अधिकारी निशा उरांव ने खुलकर यह आरोप लगाया है कि समाज के एक खास वर्ग और मुख्यधारा के विचारकों की यह पुरानी और दबी हुई आदत बन चुकी है कि वे किसी एक व्यक्ति या घटना की आधी-अधूरी जानकारी को पूरे आदिवासी समाज की पहचान बताकर उसे सार्वजनिक मंचों पर थोपने का काम करते हैं। उनका यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब देश के विभिन्न हिस्सों में आदिवासी अस्मिता, उनके धार्मिक अधिकारों और रूढ़िवादी परंपराओं को लेकर बौद्धिक और राजनीतिक गलियारों में लगातार बहस छिड़ी हुई है। निशा उरांव ने इस बात पर गहरी चिंता जताई है कि किस तरह से फिल्मों, साहित्यों और मीडिया के एक बड़े हिस्से में आदिवासियों को लेकर रूढ़िवादिता फैलाई जाती है, जिससे उनकी वास्तविक पहचान और उनके महान इतिहास के साथ अन्याय होता है। उनके इस मुखर विरोध ने एक बार फिर से इस संवेदनशील मुद्दे को राष्ट्रीय पटल पर ला खड़ा किया है, जिस पर देश भर के बुद्धिजीवी अपनी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।

आधी-अधूरी जानकारी को पूरे समाज पर थोपने की प्रवृत्ति पर गहरी आपत्ति और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा

अपने बयानों के जरिए निशा उरांव ने इस बात को बहुत स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि आदिवासी समाज कोई एकरंगी (Monolithic) समुदाय नहीं है, बल्कि इसमें सैकड़ों अलग-अलग जनजातियां, उनकी अपनी अनूठी बोलियां, खान-पान, कला और प्रकृति के साथ जीने की बेहद समृद्ध परंपराएं शामिल हैं। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि किसी सुदूर इलाके में घटने वाली किसी व्यक्तिगत घटना या अज्ञानतावश फैलाई गई अफवाह को आधार बनाकर पूरे आदिवासी समाज के चरित्र या उसकी संस्कृति का आकलन करना सरासर गलत और वैचारिक रूप से बेईमानी है। समाज के तथाकथित संभ्रांत वर्ग पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि आदिवासी हमेशा से प्रकृति के सबसे बड़े संरक्षक रहे हैं और उनका जीवन दर्शन इंसानियत, समानता और सह-अस्तित्व पर आधारित है, लेकिन इसके बावजूद एक सोची-समझी रणनीति के तहत उनकी पहचान को धुंधला करने का प्रयास किया जाता रहा है। उन्होंने आदिवासी युवाओं और बुद्धिजीवियों से आह्वान किया कि वे अपनी संस्कृति के खिलाफ होने वाले ऐसे बौद्धिक हमलों का तथ्यात्मक और मजबूत विरोध करें। जब तक समाज के लोग खुद आगे आकर अपनी सही बात दुनिया के सामने नहीं रखेंगे, तब तक बाहरी लोग उनके बारे में अपनी मर्जी की अधूरी और भ्रामक कहानियां गढ़ते रहेंगे। उनके इस बयान ने आदिवासी समुदायों के बीच एक नई चेतना जगाने का काम किया है, और लोग सोशल मीडिया से लेकर जमीनी स्तर तक इस पर अपनी सहमति जता रहे हैं।

मुख्यधारा के समाज और आदिवासी अस्मिता के बीच की खाई, भविष्य की दिशा और सुधार की जरूरत

IRS अधिकारी निशा उरांव द्वारा उठाया गया यह मुद्दा केवल एक बयान भर नहीं है, बल्कि यह भारत के सामाजिक ताने-बाने में लंबे समय से चली आ रही उस उपेक्षा की कहानी है जो आदिवासी समुदायों को अक्सर हाशिए पर धकेल देती है। मुख्यधारा के समाज को यह समझने की सख्त जरूरत है कि आदिवासियों की अपनी एक स्वायत्त कानूनी, सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान है, जिसे संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची के तहत विशेष संरक्षण प्राप्त है। जब तक देश के नीति-निर्माता, शिक्षाविद और मीडियाकर्मी आदिवासियों को सहानुभूति की दृष्टि से देखने के बजाय उन्हें उनके बराबर के नागरिक और राष्ट्र निर्माता के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक इस तरह के वैचारिक टकराव सामने आते रहेंगे। निशा उरांव की यह बेबाक टिप्पणी इस बात की याद दिलाती है कि प्रशासनिक पदों पर बैठे जिम्मेदार अधिकारियों जब अपनी जड़ों और समाज के अधिकारों के लिए मुखर होते हैं, तो वह आवाज दूर तक जाती है। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि उनके इस तीखे हमले के बाद मुख्यधारा की सोच में कितना बदलाव आता है और क्या आदिवासी संस्कृति को लेकर समाज का रवैया अधिक संवेदनशील और तथ्यात्मक बनता है या नहीं।