Iran Israel war : 'पहाड़ों के सूरमा कुर्द लड़ाके इस बार क्यों हैं शांत? ट्रंप के बदलते सुर और गुफाओं में छिपी सेना का सच
News India Live, Digital Desk: मिडिल ईस्ट में जारी भीषण युद्ध के बीच एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। ईरान के 'जानी दुश्मन' माने जाने वाले खूंखार कुर्द लड़ाके, जो अपनी छापामार लड़ाई (Guerrilla Warfare) के लिए दुनिया भर में मशहूर हैं, इस बार पूरी तरह खामोश हैं। 28 फरवरी को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर संयुक्त हमला बोला, तब कयास लगाए जा रहे थे कि कुर्द लड़ाके इस सुनहरे मौके का फायदा उठाकर ईरान के भीतर कोहराम मचा देंगे। लेकिन हकीकत इसके उलट है; कुर्द लड़ाके अपनी पहाड़ी गुफाओं से बाहर निकलने को तैयार नहीं हैं।
डोनाल्ड ट्रंप के बदलते बयान और कुर्दों की रणनीति
इस खामोशी के पीछे की एक बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बदलते समीकरण माने जा रहे हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 5 मार्च को खुलेआम कुर्द लड़ाकों का आह्वान करते हुए कहा था कि यह सही समय है जब कुर्द सेनाओं को ईरान की सरकार पर हमला कर देना चाहिए। लेकिन महज दो दिन बाद ही ट्रंप के सुर बदल गए। उन्होंने कहा कि युद्ध को और अधिक उलझाना ठीक नहीं है और कुर्दों को इसमें शामिल होने की जरूरत नहीं है। दूसरी ओर, कुर्द लड़ाके भी अब किसी महाशक्ति की 'पैदल सेना' (Foot Soldiers) बनकर इस्तेमाल नहीं होना चाहते।
गुफाओं में छिपी 'पीजेएके' (PJAK) की रहस्यमयी ताकत
कुर्द लड़ाके दुर्गम पहाड़ों और सुरंगों में रहने के आदी हैं। ईरान की खुफिया एजेंसियों और इराक में सक्रिय उनके गुर्गों से बचने के लिए वे इन्हीं गुफाओं का सहारा लेते हैं। 'कुर्दिस्तान फ्री लाइफ पार्टी' (PJAK) इनका प्रमुख संगठन है, जो ईरान की धरती पर वापसी का दावा तो करता है, लेकिन अपने लड़ाकों की सटीक संख्या को हमेशा गुप्त रखता है। इनका इतिहास उत्पीड़न और संघर्ष से भरा रहा है। 1979 की इस्लामी क्रांति हो या 2026 के हालिया विरोध प्रदर्शन, ईरान की सेना ने हमेशा कुर्द इलाकों में सख्त कार्रवाई की है, जिससे इनके बीच दुश्मनी की खाई और गहरी हो गई है।
कौन हैं कुर्द और क्या है इनका गौरवशाली इतिहास?
कुर्द लोगों को मेसोपोटामिया का मूल निवासी माना जाता है। आज के सीरिया, इराक, ईरान और तुर्की का एक बड़ा हिस्सा कभी मेसोपोटामिया कहलाता था। मध्य पूर्व में अरबों, तुर्कों और फारसियों के बाद कुर्द चौथी सबसे बड़ी आबादी हैं, जिनकी संख्या लगभग 4 करोड़ है। ये मुख्य रूप से सुन्नी मुसलमान हैं और कुर्दिश भाषा बोलते हैं। हालांकि, इनकी धार्मिक विविधता भी काफी है; कई कुर्द यजीदी, ईसाई, यहूदी और पारसी धर्म को भी मानते हैं। इनका इतिहास हसनवायिद और अय्यूबिद जैसे शक्तिशाली राजवंशों से जुड़ा है, जिनका शासन कभी उत्तरी अफ्रीका तक फैला था।
बिना देश की सबसे बड़ी आबादी: आजादी का अधूरा सपना
दुनिया में कुर्दों की सबसे ज्यादा आबादी तुर्की में रहती है (अकेले इस्तांबुल में 30 लाख)। पहले विश्वयुद्ध के बाद कुर्दों के लिए एक स्वतंत्र राष्ट्र का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन तुर्की के स्वतंत्रता संग्राम के बाद इसे खारिज कर दिया गया। 1922 में 'कुर्दिस्तान साम्राज्य' की घोषणा तो हुई, लेकिन वह लंबे समय तक टिक नहीं सका। आज भी कुर्द लोग सीरिया, इराक और ईरान के अलग-अलग हिस्सों में बिखरे हुए हैं, लेकिन उनके पास अपना कोई संप्रभु देश नहीं है। यही वजह है कि वे हर बड़े युद्ध में अपनी आजादी की संभावना तलाशते हैं, मगर इस बार उन्होंने 'इंतजार करो और देखो' की नीति अपनाई है।