पड़ोसी देश नेपाल में फिर सियासी भूचाल, आधी रात को संसद भंग, अब आगे क्या होगा?

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 हमारे पड़ोसी देश नेपाल से एक बहुत बड़ी राजनीतिक खबर आ रही है, जिसने वहां की राजनीति में एक बार फिर से हड़कंप मचा दिया है। वहां चल रही राजनीतिक उथल-पुथल के बीच एक बड़ा फैसला लेते हुए अंतरिम प्रधानमंत्री की सिफारिश पर संसद को भंग कर दिया गया है।

यह फैसला आधी रात को लिया गया, जिसके बाद देश में एक बार फिर से राजनीतिक अनिश्चितता का माहौल बन गया है। संसद भंग होने के साथ ही देश को एक बार फिर चुनाव की आग में झोंकने की तैयारी शुरू हो गई है। खबरों के मुताबिक, 21 मार्च 2026 को देश में नए सिरे से चुनाव कराने का प्रस्ताव रखा गया है।

आखिर नेपाल में बार-बार ऐसा क्यों होता है?

अगर आप नेपाल की राजनीति पर थोड़ी भी नज़र रखते हैं, तो आपको पता होगा कि वहां के लिए यह कोई नई बात नहीं है। पिछले कई सालों से नेपाल राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुज़र रहा है। यहाँ 'कुर्सी का खेल' इतना तेज़ चलता है कि सरकारें बनती हैं और ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती हैं।

किसी भी पार्टी को बहुमत न मिलना, नेताओं की आपसी खींचतान और महत्वाकांक्षा, और कभी-कभी बाहरी ताकतों का दखल... ये वो बड़ी वजहें हैं जिनके चलते नेपाल की राजनीति कभी स्थिर नहीं हो पाती।

इस फैसले का आम आदमी पर क्या होगा असर?

जब भी काठमांडू में सरकारें बनती-बिगड़ती हैं, तो इसका सबसे ज़्यादा असर वहां के आम आदमी की ज़िंदगी पर पड़ता है।

  • विकास के काम रुक जाते हैं: जो भी योजनाएं चल रही होती हैं, वे सब ठंडे बस्ते में चली जाती हैं।
  • महंगाई और बेरोज़गारी बढ़ती है: राजनीतिक अनिश्चितता का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है, जिससे आम आदमी की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं।
  • भविष्य को लेकर चिंता: लोगों के मन में यह डर बैठ जाता है कि पता नहीं आगे क्या होगा।

भारत के लिए क्यों है यह चिंता की बात?

नेपाल सिर्फ हमारा पड़ोसी नहीं, बल्कि एक बहुत ही अहम और करीबी दोस्त है। नेपाल में जब भी राजनीतिक अस्थिरता होती है, तो इसका असर भारत पर भी पड़ता है। एक स्थिर और मज़बूत सरकार भारत के हित में होती है। अस्थिरता का फायदा अक्सर चीन जैसी ताकतें उठाने की कोशिश करती हैं, जो भारत के लिए हमेशा से एक चिंता का विषय रहा है।

कुल मिलाकर, नेपाल एक बार फिर एक मुश्किल राजनीतिक चौराहे पर आ खड़ा हुआ है। अब सबकी नज़रें इस पर टिकी हैं कि क्या आने वाले चुनाव देश को एक स्थिर सरकार दे पाएंगे या फिर यह 'आया राम, गया राम' का खेल यूँ ही चलता रहेगा।

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