Holi 2026 : शाहजहाँपुर में जूतों और झाड़ू से पीटे गए लाट साहब, 18वीं सदी से चली आ रही इस अनोखी परंपरा के पीछे का क्या है इतिहास

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News India Live, Digital Desk: उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर की होली पूरे देश में अपनी अनूठी परंपरा के लिए मशहूर है। यहाँ होली के मौके पर 'लाट साहब' का जुलूस निकाला जाता है, जिसमें उन्हें भैंसा गाड़ी पर बैठाकर जूतों और झाड़ूओं से पीटा जाता है। 3 मार्च 2026 को आयोजित इस जुलूस में हजारों की भीड़ उमड़ी और सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच इस परंपरा को निभाया गया।

1. कौन होते हैं 'लाट साहब' और कैसे निकलता है जुलूस? (The Procession)

इस परंपरा के तहत एक व्यक्ति को 'लाट साहब' बनाया जाता है। उन्हें एक भैंसा गाड़ी पर सिंहासननुमा कुर्सी पर बैठाया जाता है।

हुंकार और जूतों की मार: जुलूस के दौरान लोग 'लाट साहब' पर जूतों और झाड़ूओं की बौछार करते हैं। यह सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह बुराई पर अच्छाई की जीत और अंग्रेजी हुकूमत के प्रति आक्रोश व्यक्त करने का एक तरीका है।

भैंसा गाड़ी का सफर: यह जुलूस शहर के चौक क्षेत्र से शुरू होकर विभिन्न रास्तों से गुजरता है, जिसमें हुरियारों की टोली नाचते-गाते चलती है।

2. 18वीं सदी से जुड़ी ऐतिहासिक कहानी (History of Laat Saheb)

इस अनोखी परंपरा की जड़ें इतिहास में काफी गहरी हैं:

नवाब बनाम अंग्रेज: लोक मान्यताओं के अनुसार, यह परंपरा 18वीं सदी में शुरू हुई थी। कहा जाता है कि नवाबों के समय में यह आपसी भाईचारे का प्रतीक था, लेकिन ब्रिटिश काल के दौरान यह अंग्रेजों के खिलाफ विरोध का एक जरिया बन गया।

प्रतीकात्मक विरोध: 'लाट साहब' को दरअसल एक अंग्रेज अधिकारी का प्रतीक माना जाता है। उन्हें जूतों से पीटना उस दमनकारी शासन के प्रति जनता के गुस्से को दर्शाने का एक सांस्कृतिक तरीका बन गया जो आज भी जारी है।

3. सुरक्षा का सख्त पहरा: 'मस्जिदों' को तिरपाल से ढका गया (Security Plan)

जुलूस के दौरान शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन बेहद सतर्क रहता है:

मस्जिदों की सुरक्षा: सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए संवेदनशील इलाकों में स्थित मस्जिदों को जुलूस निकलने से पहले तिरपाल (Tarpin) से पूरी तरह ढक दिया जाता है ताकि उन पर रंग न पड़े।

भारी पुलिस बल: जुलूस के रास्ते में आरएएफ (RAF), पीएसी (PAC) और भारी संख्या में पुलिस बल तैनात रहता है। ड्रोन कैमरों से पूरी बारात की निगरानी की जाती है।

4. गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल

हैरानी की बात यह है कि इस जुलूस में जूतों की मार के बावजूद, शहर में भाईचारा बना रहता है। स्थानीय मुस्लिम और हिंदू समुदाय के लोग मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि परंपरा भी पूरी हो जाए और शहर का अमन-चैन भी न बिगड़े। 'लाट साहब' बनने वाले व्यक्ति को प्रशासन और आयोजन समिति की ओर से विशेष पुरस्कार और सुरक्षा दी जाती है।

5. शाहजहाँपुर होली के अन्य आकर्षण

लाट साहब के जुलूस के साथ-साथ यहाँ 'छोटे लाट साहब' की भी बारात निकाली जाती है। यह आयोजन देखने के लिए न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि देश के अन्य हिस्सों से भी पर्यटक और फोटोग्राफर शाहजहाँपुर पहुँचते हैं।