केरल में हाई वोल्टेज ड्रामा ,जब राज्यपाल ने केंद्र के खिलाफ बोलने से किया इनकार मच गई अफरा-तफरी

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News India Live, Digital Desk: लोकतंत्र में विधानसभा की कार्यवाही बड़े ही नियमों के साथ चलती है, लेकिन जब संवैधानिक पदों पर बैठे दो बड़े चेहरे यानी 'राज्यपाल' और 'मुख्यमंत्री' एक-दूसरे के विचारों से सहमत न हों, तो दृश्य कुछ अलग ही होता है। केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान (लेख में आरलेकर का ज़िक्र लिंक में है पर सामान्यतः केरल में खान और गोवा में आरलेकर रहे हैं, लेख संदर्भ अनुसार राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर द्वारा पन्ने पलटना चर्चा में है) ने सदन के सामने अभिभाषण तो पढ़ा, लेकिन उन्होंने उस स्क्रिप्ट के कुछ चुनिंदा पैराग्राफों को छोड़ दिया।

विवाद आखिर क्या है?
दरअसल, परंपरा के मुताबिक राज्यपाल जो भाषण पढ़ते हैं, उसे राज्य सरकार की कैबिनेट तैयार करती है। इसमें अक्सर केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना और राज्य की उपलब्धियों का ज़िक्र होता है। खबर है कि इस बार भाषण में केंद्र सरकार के खिलाफ कुछ कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। राज्यपाल को शायद ये बात पसंद नहीं आई और उन्होंने उन 'विवादास्पद' हिस्सों को छोड़ते हुए अपना संबोधन खत्म कर दिया।

मुख्यमंत्री ने क्या किया?
राज्यपाल के सदन से बाहर निकलते ही मुख्यमंत्री ने कमान संभाली। उन्होंने सदन में राज्यपाल द्वारा छोड़े गए हिस्सों सहित पूरा भाषण पढ़कर सुनाया। इसे सरकार की ओर से एक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है कि—"हमारी आवाज़ को दबाना इतना आसान नहीं है।"

क्या ये महज़ एक संयोग है या पुरानी तकरार?
केरल जैसे राज्यों में, जहाँ गैर-भाजपा सरकारें हैं, राजभवन (राज्यपाल का घर) और सचिवालय (मुख्यमंत्री का दफ्तर) के बीच ऐसी खींचतान अब आम होती जा रही है। चाहे वो बंगाल हो, तमिलनाडु हो या केरल, राज्यपालों द्वारा सरकारी निर्णयों पर सवाल उठाना या भाषण के अंशों को छोड़ना एक 'पॉलिटिकल ट्रेंड' सा बन गया है।

लोकतंत्र के लिए ये क्या संकेत हैं?
सियासी जानकार इसे संघीय ढांचे (Federal Structure) के लिए अच्छी खबर नहीं मानते। राज्यपाल को केंद्र और राज्य के बीच एक 'सेतु' या पुल की तरह काम करना चाहिए, न कि बाधा की तरह। जब रक्षक ही एक-दूसरे की नीयत पर शक करने लगें, तो विकास और जनता के मुद्दे कहीं न कहीं पीछे छूट जाते हैं।

आज केरल विधानसभा में जो हुआ, वो आने वाले समय में देश के संवैधानिक समीकरणों को और भी पेचीदा बना सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अब बातचीत का कोई रास्ता निकलता है या यह 'शीत युद्ध' (Cold War) ऐसे ही जारी रहेगा।

आप क्या सोचते हैं?
क्या राज्यपाल को राज्य सरकार की ओर से लिखी गई हर बात पढ़नी चाहिए, या उन्हें अपनी समझ से बदलाव करने का हक है? कमेंट्स में अपनी बेबाक राय हमें ज़रूर बताएं!