हरियाणा में सैटेलाइट डेटा में घटी पराली जलाने की घटनाएं, पर असली वजह हैरान करने वाली
उत्तर भारत में सर्दियों की दस्तक के साथ ही दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा के आसमान में छाने वाले जहरीले स्मॉग (Smog) को लेकर सरकारें और पर्यावरण एजेंसियां हमेशा सतर्क रहती हैं। इस साल हरियाणा सरकार और प्रशासन द्वारा पेश किए गए सैटेलाइट डेटा में पराली जलाने (Stubble Burning) की घटनाओं में भारी कमी दर्ज की गई है, जिसकी शुरुआती दौर में अधिकारियों द्वारा काफी सराहना की जा रही थी। हालांकि, जैसे ही धरातल पर जाकर जमीनी हकीकत का जायजा लिया गया, तो सामने आई वजह ने सभी को हैरान कर दिया है। राज्य के करनाल, कैथल, कुरुक्षेत्र और जींद जैसे प्रमुख धान उत्पादक जिलों से यह बात सामने आ रही है कि सैटेलाइट डेटा में गिरावट वास्तव में जमीनी स्तर पर आग का रुकना नहीं, बल्कि किसानों द्वारा सैटेलाइट मॉनिटरिंग सिस्टम को चकमा देने के नए और नायाब तरीके ढूंढ निकालना है।
करनाल और कैथल में सैटेलाइट को चकमा देने की तकनीक, जानिए कैसे बच रहे हैं किसान
अंतरिक्ष एजेंसी इसरो (ISRO) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सैटेलाइट्स (जैसे नासा का VIIRS और MODIS सेंसर) किसी भी क्षेत्र में तापमान में होने वाली अचानक वृद्धि यानी 'थर्मल विसंगति' (Thermal Anomaly) के आधार पर आग की पहचान करते हैं। सैटेलाइट आमतौर पर दिन में निश्चित समय (दोपहर 1:00 बजे से 3:00 बजे के बीच) पर संबंधित क्षेत्रों के ऊपर से गुजरते हैं और तस्वीरें लेते हैं। करनाल और कैथल के किसानों ने इस सैटेलाइट ट्रैकिंग की समय सारणी का अंदाजा लगा लिया है। किसान अब दोपहर के समय पराली में आग लगाने के बजाय देर शाम, सूरज ढलने के बाद या फिर अल सुबह तड़के आग लगा रहे हैं, जब सैटेलाइट उस क्षेत्र के ऊपर से नहीं गुजरता। इसके अलावा, कई जगहों पर पराली के छोटे-छोटे ढेर बनाकर धीरे-धीरे जलाया जा रहा है ताकि एक साथ ज्यादा तापमान पैदा न हो और सैटेलाइट के इंफ्रारेड सेंसर में इसकी लोकेशन डिटेक्ट न हो सके।
चालान और एफआईआर के डर ने किसानों को मजबूर किया नए रास्ते तलाशने पर
हरियाणा में पराली जलाने पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) और राज्य सरकार के सख्त निर्देश लागू हैं। प्रशासन द्वारा सैटेलाइट लोकेशन के आधार पर पटवारियों और पुलिस टीमों को सीधे मौके पर भेजकर भारी-भरकम चालान काटे जा रहे हैं, रेड एंट्री (मेरी फसल मेरा ब्योरा पोर्टल पर ब्लैकलिस्टिंग) की जा रही है और किसानों पर आपराधिक मामले दर्ज किए जा रहे हैं। अपनी आजीविका और अगली फसल (गेहूं) की समय पर बुवाई को लेकर चिंतित किसान भारी जुर्माने और कानूनी पचड़ों से बचने के लिए इन तकनीकों का सहारा ले रहे हैं। किसानों का कहना है कि सरकार द्वारा दी जाने वाली बेलर (Baler) मशीनें, सब्सिडी और पराली प्रबंधन के उपाय नाकाफी हैं तथा प्रति एकड़ मिलने वाला मुआवजा उनकी लागत को पूरा नहीं करता। इस वजह से वे मशीनों का इंतज़ार करने के बजाय चोरी-छिपे आग लगाने को मजबूर हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता और धरातल पर मॉनिटरिंग तंत्र को मजबूत करने की चुनौती
सरकारी कागजों और सैटेलाइट ग्राफ में पराली की घटनाएं भले ही कम दिख रही हों, लेकिन वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) में लगातार हो रही गिरावट इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि पराली का धुआं अभी भी हवा को जहरीला बना रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों और कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि केवल अंतरिक्ष से सैटेलाइट निगरानी पर निर्भर रहना इस गंभीर समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। जब तक प्रशासनिक टीमें रात के समय खेतों में गश्त नहीं बढ़ाएंगी और किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के लिए समय पर व किफायती विकल्प उपलब्ध नहीं कराएंगी, तब तक कागजी आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच का यह अंतर बना रहेगा। हरियाणा प्रशासन अब देर रात तक ड्रोन कैमरे से निगरानी करने और फील्ड टीमों की संख्या बढ़ाने पर विचार कर रहा है ताकि सैटेलाइट को चकमा देने वाले इस नए ट्रेंड पर लगाम लगाई जा सके।