थार के रेगिस्तान में अकाल की आहट और जल संकट से जूझते बाड़मेर-जैसलमेर के गांव

थार के रेगिस्तान में अकाल की आहट और जल संकट से जूझते बाड़मेर-जैसलमेर के गांव

राजस्थान का सुदूर पश्चिमी भूभाग, जिसे पूरा देश और दुनिया थार के महान रेगिस्तान के रूप में जानती है, सदियों से जल संकट और अकाल (Drought) की विभीषिका झेलता रहा है। बाड़मेर और जैसलमेर जिलों में कम बारिश, तपती धूप और गिरते भूजल स्तर के कारण हर साल पीने के पानी और खेती-बाड़ी को लेकर हाहाकार मच जाता है। आधुनिक समय में बोरवेल, ट्यूबवेल और नहरी तंत्र के आने के बावजूद जब भूजल का स्तर पाताल में चला गया और बोरवेल भी सफेद हाथी साबित होने लगे, तो स्थानीय ग्रामीणों और किसानों को एक बार फिर अपने पूर्वजों की उस बुद्धिमत्ता और ज्ञान की याद आ गई है, जिसने शताब्दियों तक इस बेआब जमीन को हरा-भरा बनाए रखा था। आज बाड़मेर और जैसलमेर के सैकड़ों गांवों में अकाल से निपटने के लिए 100 साल से भी अधिक पुरानी जल संरक्षण की पारंपरिक तकनीकों को बड़े पैमाने पर फिर से पुनर्जीवित किया जा रहा है।

क्या है 100 साल पुरानी 'खडीन' और 'बेरी' तकनीक? जानिए पूर्वजों का जल प्रबंधन का अचूक विज्ञान

जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणों और बाड़मेर के स्थानीय निवासियों द्वारा सदियों पहले विकसित की गई 'खडीन' (Khadin) तकनीक जल प्रबंधन का एक ऐसा बेजोड़ नमूना है, जिसे देखकर आज के आधुनिक इंजीनियर भी दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। इस तकनीक में ढलान वाले इलाकों के निचले मैदानी हिस्से में तीन तरफ मिट्टी का मजबूत बांध या मेढ़ (Embankment) बना दिया जाता है। जब मानसूनी बारिश होती है, तो विशाल कैचमेंट एरिया का बहता हुआ पानी इस खडीन में आकर इकट्ठा हो जाता है। यह रुका हुआ पानी धीरे-धीरे जमीन के अंदर रिसता है, जिससे न केवल आसपास का भूजल स्तर (Groundwater Level) तेजी से ऊपर उठता है बल्कि मिट्टी में महीनों तक इतनी पर्याप्त नमी बनी रहती है कि बिना किसी अतिरिक्त सिंचाई के भी गेहूं, चना, सरसों और जीरे जैसी रबी की फसलों की शानदार पैदावार ली जा सकती है। इसके साथ ही खडीन के निचले हिस्से में 'बेरी' (छोटी कुइयां) बनाई जाती हैं, जो साल भर मीठे और पीने योग्य पानी का निर्बाध स्रोत बनी रहती हैं।

आधुनिक साधनों की नाकामी के बाद पारंपरिक जल संचयन बना बाड़मेर-जैसलमेर का सुरक्षा कवच

पिछले कुछ दशकों में अत्यधिक भूजल दोहन और डीप बोरवेल पर बढ़ती निर्भरता ने थार क्षेत्र के प्राकृतिक जल चक्र को भारी नुकसान पहुंचाया था। हालांकि, जब भूजल खारा होने लगा और नहरी सप्लाई भी भीषण गर्मियों में हांफने लगी, तब स्थानीय लोगों को समझ आया कि मशीनी साधन अकाल का स्थायी हल नहीं हो सकते। आज बाड़मेर और जैसलमेर के दूर-दराज के गांवों में किसान सामूहिक श्रमदान और सरकारी योजनाओं की मदद से अपनी पुरानी खडीनों, टांकों और बेरियों की गाद निकालकर उन्हें फिर से क्रियाशील बना रहे हैं। इस पारंपरिक पुनरुद्धार से न केवल सैकड़ों हेक्टेयर बंजर जमीन फिर से उपजाऊ बन रही है, बल्कि भीषण गर्मी के दिनों में भी ग्रामीणों और उनके मवेशियों के लिए पानी की एक-एक बूंद सुरक्षित हो रही है। यह पहल साबित करती है कि जलवायु परिवर्तन और अकाल की महाचुनौती से निपटने का असली जवाब हमारे पूर्वजों की विरासत और प्राचीन पर्यावरण अनुकूल तकनीकों में ही छिपा हुआ है।