डर या वैराग्य? आखिर क्यों राख लपेटकर मुर्दों के बीच बैठते हैं महादेव सृष्टि के सबसे बड़े सच का खुलासा
News India Live, Digital Desk: दुनिया में शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे 'मौत' या 'श्मशान' के नाम से डर न लगता हो। हम सब उस जगह से दूर भागते हैं जिसे जीवन का आखिरी पड़ाव कहा जाता है। लेकिन ज़रा सोचिए, जिन्हें हम 'देवों के देव महादेव' कहते हैं, जो पूरी सृष्टि के स्वामी हैं, उन्होंने रहने के लिए स्वर्ग के सुखों को छोड़कर उस डरावनी राख और वीरान श्मशान को ही क्यों चुना?
यह सवाल सुनने में जितना सीधा लगता है, इसका जवाब उतना ही गहरा और रूह को छू लेने वाला है। आइए, इसे थोड़े सरल और मानवीय नज़रिए से समझने की कोशिश करते हैं।
1. सत्य से रूबरू होने की जगह
हम अपनी पूरी ज़िंदगी सुख-सुविधाओं, रिश्तों और अहंब्रह्मास्मि के पीछे भागते रहते हैं। लेकिन श्मशान वह इकलौती जगह है जहाँ पहुंचकर इंसान के सारे मुखौटे उतर जाते हैं। वहाँ न कोई अमीर है, न कोई गरीब। शिव का श्मशान में रहना हमें यह याद दिलाता है कि यह शरीर 'नश्वर' है और अंत में सबको यहीं मिट्टी (राख) होना है। शिव उस कड़वे लेकिन शाश्वत सत्य के साथ रहना पसंद करते हैं जिसे दुनिया नजरअंदाज करती है।
2. शिव का 'भस्म' से प्रेम
महादेव अपने पूरे शरीर पर चिता की राख (भस्म) लपेटते हैं। इसका एक बहुत बड़ा मतलब है। आग हर चीज़ को जला देती है, लेकिन जो अंत में बचता है, वही 'सार' है—यानी राख। भस्म इस बात का प्रतीक है कि जब आपके भीतर के विकार, वासनाएं और अहंकार जल जाते हैं, तब आप पूरी तरह शुद्ध और शिव के करीब हो जाते हैं।
3. सामाजिक भेदभाव का अंत
हम अक्सर 'शुभ' और 'अशुभ' के बीच दीवारें खींच लेते हैं। मंदिर शुभ है और श्मशान अशुभ। लेकिन शिव तो पूर्ण हैं। उनके लिए कोई भेद नहीं है। वे उन भूतों-पिशाचों और रूहों को भी शरण देते हैं जिन्हें समाज ठुकरा देता है। श्मशान में रहने का मतलब यह भी है कि परमात्मा उस जगह भी मौजूद है जिसे हम त्याग चुके हैं।
4. शांति और परम वैराग्य
दुनिया का शोर-शराबा अक्सर हमारे मन को बेचैन कर देता है। शिव परम योगी हैं, उन्हें शांति और शून्य पसंद है। श्मशान एक ऐसी जगह है जहाँ सन्नाटा होता है, जहाँ मोह-माया का अंत हो जाता है। इसी शून्यता में ध्यान और मोक्ष का रास्ता खुलता है। महादेव हमें सिखाते हैं कि जब तक आप पुरानी पहचान को 'खत्म' नहीं करेंगे, तब तक नई चेतना का 'जन्म' नहीं होगा।