Controversy over cinema's story: उदयपुर फाइल्स के निर्माता ने दर्शकों को लगाई फटकार, पूछा अपनी फिल्में क्यों नहीं देखते
- by Archana
- 2025-08-16 17:52:00
News India Live, Digital Desk: Controversy over cinema's story: बॉलीवुड में इन दिनों जहां कुछ फिल्में शानदार प्रदर्शन कर रही हैं, वहीं दर्शकों की पसंद को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है. फिल्म 'उदयपुर फाइल्स' के प्रोड्यूसर प्रदीप मिश्रा ने अपने हिंदू दर्शकों पर गंभीर सवाल उठाए हैं और उन्हें कथित रूप से "अपनी ही फिल्में" न देखने के लिए लताड़ा है. उनका यह बयान उस समय आया जब वे उन दर्शकों पर निशाना साध रहे थे, जिन्होंने 'सैयारा-2' और 'कुली' जैसी फिल्मों को समर्थन दिया, लेकिन उनकी फिल्म को नहीं.
मीडिया से बातचीत करते हुए, 'उदयपुर फाइल्स' के निर्माता ने कड़े शब्दों में कहा कि कुछ लोगों का सोचना है कि उन्हें केवल वह सिनेमा देखना चाहिए जो उनका 'मनोरंजन' करता है, चाहे वह अश्लील हो या उनके विचारों के खिलाफ हो. इसी संदर्भ में उन्होंने तंज कसते हुए कहा, "इनकी गलती क्या है? जैसे पहले मरा हुआ था वैसे फिर मर रहा है, मरा हुआ हिंदू ही है. जब तक ऐसा हिंदू रहेगा, ऐसा ही काम करेगा." इस बेहद तीखी टिप्पणी ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है और दर्शक अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं. (संदर्भ)
प्रदीप मिश्रा के इस बयान से साफ पता चलता है कि वे दर्शकों के फिल्मों के चयन से असंतुष्ट हैं. उनकी यह नाराजगी इस बात को लेकर है कि कुछ दर्शक मनोरंजन और बड़े स्टार्स की चमक के पीछे भागते हैं, बजाय इसके कि वे उन फिल्मों को समर्थन दें जो सामाजिक, ऐतिहासिक या विशेष रूप से धार्मिक/सांस्कृतिक विषयों पर आधारित होती हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ दर्शक ऐसे सिनेमा को प्राथमिकता देते हैं जो नैतिक या सामाजिक संदेशों को छोड़ कर केवल 'उलजुलूल' कंटेंट पर केंद्रित होता है.
'उदयपुर फाइल्स' जैसी फिल्में अक्सर विशिष्ट मुद्दों या सच्ची घटनाओं पर आधारित होती हैं और एक निश्चित वर्ग के दर्शकों से समर्थन की उम्मीद रखती हैं. वहीं, 'सैयारा-2' (संभवतः 'जवान' जैसी किसी बड़ी ब्लॉकबस्टर एक्शन फिल्म का संकेत) और 'कुली' (एक मुख्यधारा की मनोरंजक फिल्म) जैसे शीर्षक बड़े बजट की बॉलीवुड फिल्में हैं जो व्यापक जनसमुदाय को आकर्षित करती हैं. इस तरह का बयान दर्शकों की स्वायत्तता पर सवाल उठाता है और फिल्मों के सामाजिक और राजनीतिक प्रभावों पर नई बहस छेड़ता है. यह दर्शाता है कि फिल्म निर्माता और दर्शक के बीच अपेक्षाओं और समझ की कमी अभी भी भारतीय सिनेमा में एक चुनौती बनी हुई है.
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