मन पर जीत या शरीर को चुनौती? खड़ेश्वर तपस्या के वे अनसुने नियम जिन्हें जानना हर किसी के लिए ज़रूरी है

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News India Live, Digital Desk: अगर आपको बस एक घंटे लगातार खड़े रहने के लिए कहा जाए, तो आधे घंटे में ही शायद आप पैरों को हिलाने या बैठने की जगह ढूंढने लगेंगे। लेकिन हमारे देश की आध्यात्मिक मिट्टी में एक ऐसी परंपरा भी है, जिसे 'खड़ेश्वर तपस्या' (Khadeshwar Tapasya) कहा जाता है। इसमें साधु-संत सालों-साल तक, बिना एक पल के लिए बैठे, सिर्फ खड़े रहकर तपस्या करते हैं।

क्या है यह खड़ेश्वर तपस्या?
जैसा कि नाम से ही पता चलता है, 'खड़' यानी खड़ा होना और 'ईश्वर' यानी भगवान। इस तपस्या को करने वाले साधुओं को 'खड़ेश्वरी बाबा' कहा जाता है। इनका संकल्प इतना मज़बूत होता है कि ये महीनों या सालों तक अपने शरीर को बैठने का सुख नहीं देते। उनके लिए खड़े रहना ही पूजा है, और यही उनका योग है।

वो सोते और खाते कैसे हैं?
हर किसी के मन में यह सवाल आता है कि आखिर कोई इंसान बिना लेटे सो कैसे सकता है? इन साधुओं का जीवन बहुत अनुशासित होता है। सोने के लिए वे अक्सर एक ऊँची मेज़ या किसी झोले (कपड़े की रस्सी) का सहारा लेते हैं, जिस पर कोहनियाँ टिकाकर वे हल्की नींद ले लेते हैं। लेकिन पैर फिर भी ज़मीन पर सीधे खड़े रहते हैं। खाना हो या भजन-कीर्तन, सब कुछ इसी एक स्थिति में होता है।

सिर्फ शरीर की नहीं, मन की है यह परीक्षा
अक्सर लोग इसे सिर्फ शारीरिक कष्ट मान लेते हैं, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से यह 'हठयोग' (Hatha Yoga) का एक हिस्सा है। खड़ेश्वर तपस्या का उद्देश्य अपने मन को इस हद तक काबू में करना है कि शरीर का कोई भी दर्द या आलस भक्ति के आड़े न आ पाए। यह साधना हमें सिखाती है कि इंसान की इच्छाशक्ति किसी भी भौतिक बाधा से बड़ी होती है।

शरीर पर क्या होता है असर?
लंबे समय तक खड़े रहने की वजह से शुरुआत में पैरों में काफी सूजन और दर्द आता है, जिसे 'संयम' और अभ्यास से धीरे-धीरे सहना सीखा जाता है। भक्त इसे भगवान की कृपा मानते हैं कि उन्हें यह शक्ति मिलती है। बहुत से साधु कुंभ के मेले में या गंगा किनारे सालों से इस मुद्रा में खड़े देखे जा सकते हैं।