एल्विश यादव को सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट सांपों के जहर वाले मामले में FIR रद्द
News India Live, Digital Desk : न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने गुरुवार (19 मार्च 2026) को यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने माना कि एल्विश यादव के खिलाफ जो आरोप लगाए गए थे और जिस प्रक्रिया के तहत मामला दर्ज किया गया था, उसमें गंभीर कानूनी खामियां थीं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के 3 बड़े आधार
प्राधिकृत अधिकारी की कमी (Wildlife Act Violation): कोर्ट ने नोट किया कि 'वन्यजीव संरक्षण अधिनियम' (Wildlife Protection Act) के तहत किसी भी मामले की शुरुआत केवल एक प्राधिकृत अधिकारी (Authorised Officer) द्वारा की गई शिकायत पर ही हो सकती है। इस मामले में FIR एक ऐसे व्यक्ति की शिकायत पर दर्ज हुई थी जो सक्षम प्राधिकारी नहीं था, इसलिए यह केस शुरुआत से ही कानूनी रूप से गलत था।
NDPS एक्ट लागू नहीं होता: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सह-आरोपियों से जो तरल पदार्थ (Anti-venom) बरामद हुआ था, वह NDPS एक्ट की अनुसूची (Schedule) में शामिल किसी भी प्रतिबंधित या नशीले पदार्थ की श्रेणी में नहीं आता है। जब बरामद पदार्थ ही ड्रग्स की श्रेणी में नहीं है, तो एनडीपीएस की धाराएं लगाना गलत था।
कोई सीधी बरामदगी नहीं: पीठ ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि एल्विश यादव के पास से व्यक्तिगत रूप से न तो कोई सांप बरामद हुआ और न ही कोई प्रतिबंधित पदार्थ। आरोप केवल 'डिस्क्लोजर स्टेटमेंट' और अप्रत्यक्ष सबूतों पर आधारित थे।
केस की पृष्ठभूमि (Case Background)
घटना: नवंबर 2023 में नोएडा के सेक्टर-49 में एक रेव पार्टी के दौरान सांपों का जहर सप्लाई करने के आरोप में एल्विश समेत कई लोगों पर FIR दर्ज हुई थी।
गिरफ्तारी: नोएडा पुलिस ने एल्विश को 17 मार्च 2024 को गिरफ्तार किया था, जिसके बाद वे कुछ दिन जेल में भी रहे थे।
हाई कोर्ट का रुख: इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया था, जिसे एल्विश ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी और कानूनी आधारों पर FIR रद्द कर दी है, लेकिन कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:
ताजा शिकायत की छूट: कोर्ट ने संबंधित सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) को यह छूट (Liberty) दी है कि यदि वे चाहें तो वन्यजीव अधिनियम की धारा 55 के तहत एक नई और उचित शिकायत दर्ज कर सकते हैं।
लोकप्रियता का असर: कोर्ट ने पिछली सुनवाई में यह भी कहा था कि "किसी व्यक्ति की लोकप्रियता उसे कानून से ऊपर नहीं बनाती", लेकिन वर्तमान फैसला पूरी तरह से कानूनी प्रक्रिया के पालन न होने पर आधारित है।