Chhattisgarh Police : 50 लाख का इनामी नक्सली देवा पुलिस की गिरफ्त में, आखिर क्यों छोड़ा खौफ का रास्ता?
News India Live, Digital Desk : छत्तीसगढ़ की राजनीति और सुरक्षा के लिहाज़ से आज का दिन बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 2 जनवरी 2026 को पुलिस मुख्यालय से आई खबर के अनुसार, माओवादियों के सबसे ताकतवर और रणनीतिक चेहरों में से एक 'देवा' ने आत्मसमर्पण कर दिया है। देवा का कद नक्सली संगठन के भीतर इतना बड़ा था कि वह न केवल रणनीतियां बनाता था, बल्कि बड़े ऑपरेशंस की अगुआई भी करता था।
₹50 लाख का इनाम और रुतबा
जब किसी पर ₹50 लाख का इनाम हो, तो उसकी गंभीरता का अंदाज़ा खुद-ब-खुद लग जाता है। देवा पर कई बड़े हमले करने, जवानों को नुकसान पहुँचाने और सड़कों को बारूद से दहलाने के आरोप थे। सालों से पुलिस उसे ढूंढ रही थी, लेकिन वह अपनी 'छापामार नीति' की वजह से हर बार बच निकलता था। लेकिन अब वक्त बदल गया है। बताया जा रहा है कि जंगलों में बढ़ती पुलिस की दबिश और खुद माओवादी संगठन के अंदरुनी कलह ने उसे कमजोर कर दिया था।
आख़िर क्यों बदला इरादा?
देवा ने जब अपने हाथ उठाए और मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया, तो उसके पीछे सरकार की 'आत्मसमर्पण और पुनर्वास' नीति (Surrender Policy) का बड़ा हाथ रहा। आजकल जंगल के अंदर मोबाइल नेटवर्क और सड़कों का जाल बिछ चुका है। देवा जैसे नेताओं को भी अब यह अहसास होने लगा है कि विकास के बिना आदिवासी समाज का भला नहीं होने वाला। उनके साथियों के लगातार कम होते जाने और बीमारी के दौरान दवाइयों की कमी ने भी उसे सरेंडर करने पर मजबूर किया होगा।
सुरक्षाबलों के लिए राहत की बात
2026 के इस दौर में छत्तीसगढ़ पुलिस और अर्धसैनिक बल 'जीरो टॉलरेंस' नीति पर काम कर रहे हैं। देवा के सरेंडर करने से पुलिस को जंगलों की उन गुप्त रास्तों और भविष्य की योजनाओं की पक्की जानकारी मिल सकती है, जिन्हें जानना अब तक नामुमकिन था। पुलिस के बड़े अधिकारियों का मानना है कि इस समर्पण के बाद संगठन के कई और छोटे-बड़े सदस्य भी हथियार डालने के लिए प्रेरित होंगे।
यह सरेंडर उन मासूम परिवारों के लिए भी सुकून की खबर है जिन्होंने नक्सली हिंसा में अपनों को खोया है। यह उम्मीद बंधाता है कि आने वाले समय में बस्तर सिर्फ़ गोलियों की गूँज के लिए नहीं, बल्कि पर्यटन और तरक्की के लिए जाना जाएगा।