छत्रपति शिवाजी महाराज और इतिहास से वो छेड़छाड़,आखिर हार मानकर ऑक्सफोर्ड को झुकना ही पड़ा
News India Live, Digital Desk: छत्रपति शिवाजी महाराज... ये नाम सुनते ही हर भारतीय का सिर गर्व से ऊँचा हो जाता है। उनके साहस, नीति और स्वाभिमान की मिसालें आज भी दी जाती हैं। लेकिन सोचिए, अगर दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय अपनी किताबों में उनके बारे में कुछ गलत या अपमानजनक लिखे, तो दुख और गुस्सा होना लाज़मी है।
हाल ही में कुछ ऐसा ही हुआ है, जिसने फिर से साबित कर दिया कि सही इतिहास की रक्षा करना कितना जरूरी है। करीब 22 साल बाद, प्रसिद्ध ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस (OUP) ने सन 2003 में छपी अपनी एक किताब में महाराज के बारे में लिखी गई गलत बातों के लिए माफी मांगी है।
आखिर विवाद क्या था?
सारा विवाद ऑक्सफोर्ड की उस किताब को लेकर था, जिसमें मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन और उनके कार्यों को सही तरीके से पेश नहीं किया गया था। आरोप थे कि किताब में महाराज को एक राजा या जननायक के बजाय गलत विशेषणों के साथ दिखाया गया, जिससे उनकी छवि धूमिल होती थी। किसी भी स्वाभिमानी नागरिक के लिए यह स्वीकार करना नामुमकिन था कि उनके 'आराध्य' के बारे में ऐसा लिखा जाए।
अब जाकर क्यों जागा 'ऑक्सफोर्ड'?
अक्सर ऐसी गलतियां दबी रह जाती हैं, लेकिन इस बार कुछ सतर्क नागरिकों और जागरूक संगठनों ने इस मुद्दे को कानूनी और सामाजिक तौर पर मजबूती से उठाया। दबाव बढ़ने लगा और मामला जब सीधे संस्थान की साख पर आया, तो उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने न केवल माफी मांगी, बल्कि उन्होंने यह साफ किया कि वे इस विवादित किताब के मौजूदा वर्जन को बाजार से वापस ले रहे हैं और इसके डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से भी उस कंटेंट को हटा दिया गया है। उन्होंने भरोसा दिलाया है कि वे किसी भी धर्म, संस्कृति या ऐतिहासिक महापुरुष का अनादर करने की मंशा नहीं रखते।
इतिहास से छेड़छाड़ क्यों है खतरनाक?
इतिहास सिर्फ बीती हुई बात नहीं होती, वो हमारी जड़ें होती हैं। अगर आज की पीढ़ी गलत जानकारी पढ़ेगी, तो आने वाले कल में वे अपने असली नायकों को पहचान नहीं पाएंगे। शिवाजी महाराज का 'गोरिल्ला युद्ध' का तरीका हो या उनका न्यायप्रिय शासन, वो आज के मैनेजमेंट छात्रों के लिए भी सीखने वाली चीज है। ऐसे महान शासक के बारे में किसी विदेशी किताब में गलत उल्लेख करना एक बड़ी चूक थी।
एक बड़ी जीत
यह माफीनामा सिर्फ एक औपचारिक पत्र नहीं है, बल्कि उन सभी लोगों की जीत है जो अपने इतिहास के लिए लड़ते हैं। यह संदेश साफ है दुनिया की कोई भी यूनिवर्सिटी हो, वह अपनी लेखनी के नाम पर तथ्यों और भावनाओं से खिलवाड़ नहीं कर सकती।
आपको क्या लगता है? क्या विदेशी प्रकाशकों को भारतीय इतिहास लिखते समय ज्यादा सावधानी नहीं बरतनी चाहिए? क्या माफी मांगना ही काफी है या भविष्य में ऐसे लेखकों पर कार्रवाई होनी चाहिए? अपनी राय जरूर साझा करें।