वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर विरासतपर चला बुलडोजर? संजय राउत ने क्यों जताई गहरी चिंता
News India Live, Digital Desk : वाराणसी की गलियाँ और वहां के घाट न जाने कितने सदियों पुराने इतिहास को समेटे हुए हैं। यहाँ का हर पत्थर एक कहानी कहता है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से वाराणसी के मणिकर्णिका घाट से कुछ ऐसी तस्वीरें और खबरें आ रही हैं, जिसने न केवल स्थानीय लोगों को बल्कि राजनीति के गलियारों को भी बेचैन कर दिया है।
मुद्दा जुड़ा है पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होलकर की विरासत से, और इस पर आवाज़ उठाई है शिवसेना (UBT) के सांसद संजय राउत ने।
क्या है पूरा मामला?
वाराणसी में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के विस्तार और घाटों के सौंदर्यीकरण का काम चल रहा है। इसी बीच खबर आई कि मणिकर्णिका घाट के पास स्थित अहिल्याबाई होलकर से जुड़े कुछ ढांचों या निर्माण को हटाया या ढाया जा रहा है। जैसे ही यह खबर फैली, महाराष्ट्र में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई। अहिल्याबाई होलकर न केवल इंदौर की महारानी थीं, बल्कि उन्होंने देशभर में मंदिरों के जीर्णोद्धार (खासकर काशी विश्वनाथ मंदिर) में जो योगदान दिया, उसके लिए हर हिंदू उनके प्रति अगाध श्रद्धा रखता है।
संजय राउत की शिंदे और योगी सरकार से अपील
संजय राउत ने इस मुद्दे पर सीधा स्टैंड लिया है। उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से अपील की है कि वे इस मामले में दखल दें। राउत का कहना है कि शिंदे जी को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बात करनी चाहिए ताकि माँ अहिल्याबाई की विरासत को कोई नुकसान न पहुँचे।
संजय राउत ने जोर देकर कहा कि "विकास ज़रूरी है, लेकिन यह हमारी गौरवशाली विरासत और महान विभूतियों की स्मृतियों की कीमत पर नहीं होना चाहिए।" उनका कहना है कि अगर अहिल्याबाई की धरोहरों को चोट पहुँचती है, तो यह करोड़ों लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने जैसा होगा।
विरासत को बचाना क्यों ज़रूरी है?
आज की भागदौड़ और आधुनिक चकाचौंध के बीच हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि हमें यहाँ तक लाने में हमारे पूर्वजों और ऐतिहासिक नायकों का कितना बड़ा योगदान रहा है। अहिल्याबाई होलकर वो शख्सियत थीं जिन्होंने उस दौर में हिंदू संस्कृति को सहेजने का काम किया जब हालात बहुत कठिन थे। ऐसे में अगर उनकी बनाई किसी भी चीज़ पर आंच आती है, तो सवाल उठना लाज़मी है।
हमारी राय
विकास और इतिहास के बीच संतुलन बनाना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। उम्मीद है कि सरकारें आपसी बातचीत से इस मुद्दे को सुलझा लेंगी और बाबा विश्वनाथ की नगरी में हमारी प्राचीन विरासत पूरी तरह सुरक्षित रहेगी।
आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या विकास के लिए पुराने निर्माणों को हटाना सही है या फिर उन्हें जैसे-तैसे बचाकर रखना ही सच्ची श्रद्धांजलि है? कमेंट्स में अपनी बात ज़रूर कहें।