Brahmaputra River Mythology : पाप धोने गए थे परशुराम ,असम की नहीं, अरुणाचल की इस जगह पर हुआ था वह चमत्कारी स्नान
News India Live, Digital Desk: भारत की नदियाँ सिर्फ जलस्रोत नहीं, बल्कि युगों पुरानी कहानियों और गहरी आस्थाओं का प्रतीक हैं। इन्हीं में से एक है ब्रह्मपुत्र, जिसे हमारे देश में एकमात्र पुरुष नदी (ब्रह्मपुत्र का अर्थ ब्रह्मा का पुत्र) के तौर पर जाना जाता है। तिब्बत के ग्लेशियरों से निकलकर, यह शक्तिशाली नदी अरुणाचल, असम और बांग्लादेश से गुजरती है।
लेकिन ब्रह्मपुत्र का नाम एक ऐसे कुंड से जुड़ा है, जिसकी कहानी हमें सीधा त्रेतायुग तक ले जाती है यह है परशुराम कुंड (Parshuram Kund)। इस कुंड की पौराणिक कहानी, पाप और मुक्ति की एक ऐसी दास्तान है जो हजारों सालों से सुनाई जाती रही है।
कौन थे परशुराम और क्यों हुआ था यह भयानक कृत्य?
परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं, जो अपनी वीरता और क्रोध के लिए विख्यात थे। वह ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र थे। कथा के अनुसार, एक बार ऋषि जमदग्नि को किसी कारणवश अपनी पत्नी माता रेणुका पर संदेह हुआ। क्रोध में आकर ऋषि ने अपने पुत्रों को आदेश दिया कि वे तुरंत अपनी माता का सिर काट दें।
डर के मारे परशुराम के सभी भाई पीछे हट गए। लेकिन परशुराम अपने पिता की आज्ञा को सबसे ऊपर मानते थे। उन्होंने बिना सोचे समझे फरसे से माता रेणुका का सिर धड़ से अलग कर दिया।
जब फरसा हाथ से चिपक गया
मान्यता है कि जैसे ही यह भयानक काम पूरा हुआ, वह फरसा परशुराम के हाथ से चिपक गया और खून से लथपथ हो गया। उन्होंने अपने पिता की आज्ञा तो मानी, लेकिन यह मातृहत्या का बहुत बड़ा पाप था।
जब जमदग्नि का क्रोध शांत हुआ, तो उन्होंने परशुराम को उनकी आज्ञा मानने के लिए वरदान मांगने को कहा। परशुराम ने पहला वरदान मांगा कि माँ रेणुका को फिर से जीवन दान मिले। और दूसरा, उनका हाथ उस फरसे से मुक्त हो जाए। ऋषि ने माँ को जीवित तो कर दिया, लेकिन हाथ से फरसा मुक्त नहीं हुआ, क्योंकि मातृहत्या का पाप सिर्फ आज्ञा से नहीं धुल सकता था।
पाप धोने के लिए पहुँचे अरुणाचल
पिता जमदग्नि ने परशुराम को सलाह दी कि वे अपने हाथ को पाप मुक्त करने के लिए तीर्थ यात्रा करें। परशुराम दुनिया भर में यात्रा करते रहे, लेकिन वह फरसा उनके हाथ से अलग नहीं हुआ।
आखिर में वे यात्रा करते हुए अरुणाचल प्रदेश के घने जंगलों वाले लोहित जिले के एक दुर्गम स्थान पर पहुंचे। इस स्थान पर, परशुराम ने जैसे ही पानी में अपने हाथ धोए, चमत्कार हुआ—फरसा तुरंत उनके हाथ से छूटकर कुंड में गिर गया।
माना जाता है कि यह जल ब्रह्मपुत्र नदी के प्रवाह क्षेत्र से ही जुड़ा हुआ है, और चूंकि इस कुंड के जल में डुबकी लगाने से ही परशुराम को उनके महापाप से मुक्ति मिली थी, इसलिए यह कुंड परशुराम कुंड के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
आज भी यह लोहित जिले का सबसे बड़ा तीर्थ स्थल माना जाता है, जहाँ खासकर मकर संक्रांति के पर्व पर पूरे देश और नेपाल से हजारों श्रद्धालु पाप धोने और आध्यात्मिक मुक्ति पाने के लिए डुबकी लगाने आते हैं।