अमेरिका के एक फैसले ने सऊदी अरब को दी बड़ी राहत, जानिए आखिर मुस्लिम ब्रदरहुड पर क्यों मचा है इतना बवाल?
News India Live, Digital Desk: दुनिया की राजनीति में कब कौन किसका दोस्त बन जाए और कब दुश्मन, यह कहना बहुत मुश्किल है। लेकिन जब बात अमेरिका और सऊदी अरब की आती है, तो उनके सुर अक्सर एक जैसे ही निकलते हैं। हाल ही में एक ऐसी खबर आई है जिसने मिडिल ईस्ट यानी मध्य पूर्व में काफी हलचल मचा दी है।
अमेरिका ने 'मुस्लिम ब्रदरहुड' (Muslim Brotherhood) और उससे जुड़े कुछ गुटों को 'आतंकी संगठन' की लिस्ट में डालने जैसा बड़ा कदम उठाया है। अब आप सोच रहे होंगे कि फैसला तो अमेरिका ने लिया, तो सऊदी अरब इतना खुश क्यों हो रहा है?
आइये, आसान शब्दों में इस पूरे मामले को डिकोड करते हैं।
सऊदी अरब के लिए यह 'राहत की सांस' क्यों है?
सच्चाई यह है कि सऊदी अरब काफी लंबे समय से यह कहता आ रहा है कि 'मुस्लिम ब्रदरहुड' उनके समाज और स्थिरता के लिए खतरा है। रियाद (सऊदी अरब की राजधानी) ने पहले ही इस संगठन को ब्लैकलिस्ट कर रखा है। उनका मानना है कि यह संगठन धर्म की आड़ में राजनीति करता है और खाड़ी देशों की सरकारों के लिए मुश्किलें पैदा करता है।
ऐसे में, जब दुनिया का सबसे ताकतवर देश—अमेरिका—भी आपकी बात पर मुहर लगा दे, तो खुश होना तो बनता है। सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने तुरंत इस फैसले का स्वागत किया है। उनके लिए यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उनकी पुरानी कूटनीतिक लड़ाई की एक बड़ी जीत है।
आतंकवाद के खिलाफ 'ग्लोबल' संदेश
सऊदी अधिकारियों का कहना है कि आतंकवाद का कोई चेहरा नहीं होता और ऐसे संगठनों पर लगाम कसना पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए जरूरी है। अमेरिका के इस फैसले से अब उन संगठनों पर नकेल कसना आसान हो जाएगा जो अलग-अलग नामों से छिपकर अपना एजेंडा चलाते थे।
सऊदी अरब का यह रिएक्शन साफ इशारा करता है कि वे अब अमेरिका के साथ मिलकर ऐसे गुटों को जड़ से खत्म करने या कमजोर करने के लिए पूरी ताकत लगाएंगे।
क्या बदलेगा अब?
यह कदम मिडिल ईस्ट की राजनीति को एक नई दिशा देगा। अमेरिका और सऊदी अरब की यह जुगलबंदी उन देशों या समूहों के लिए खतरे की घंटी है, जो मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थन करते हैं। कुल मिलाकर, सऊदी अरब अब खुद को ज्यादा सुरक्षित और अपनी नीतियों को सही साबित करने की स्थिति में महसूस कर रहा है।
यह खबर बताती है कि जब दो बड़े देश किसी एक मुद्दे पर सहमत होते हैं, तो उसका असर सीमाओं के पार तक महसूस किया जाता है। अब देखना यह है कि इस फैसले के बाद दूसरे मुस्लिम देश किस तरह से रिएक्ट करते हैं।