पड़ोस के हार ने उड़ाई अखिलेश की नींद? तेजस्वी की स्थिति देख अब ओवैसी को लेकर नरम हुए सपा के तेवर
News India Live, Digital Desk : बिहार उपचुनावों के नतीजों और वहां वोट बंटवारे के पैटर्न को देखने के बाद अब समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव काफी सतर्क नजर आ रहे हैं। उन्हें डर है कि अगर उत्तर प्रदेश में भी वोटों का बिखराव हुआ, तो 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का फॉर्मूला कमजोर पड़ सकता है। यही वजह है कि अब सपा उन दलों को भी साथ लेने के संकेत दे रही है, जिनसे वह कभी दूरी बनाकर चलती थी।
ओवैसी को लेकर क्यों बदल रहे सुर?
अभी तक असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी (AIMIM) को सपा अक्सर 'वोट काटने वाली पार्टी' या किसी की 'बी-टीम' कहकर संबोधित करती रही है। लेकिन हाल ही में सपा के एक सांसद ने जो बयान दिया है, उसने सबको चौंका दिया। सांसद का कहना है कि, "भाजपा को हराने के लिए जो भी साथ आना चाहता है, उसका स्वागत है।"
यह एक बड़ा बदलाव है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव अब यह जोखिम नहीं लेना चाहते कि मुस्लिम वोटों का जरा भी बंटवारा हो। तेजस्वी की हार ने यह साफ कर दिया है कि अगर छोटी-छोटी पार्टियां अपना वोट बैंक काटती हैं, तो बड़ा नुकसान मुख्य विपक्षी दल को ही भुगतना पड़ता है।
सांसद की 'वेलकम' वाली बात के पीछे की कहानी
दरअसल, समाजवादी पार्टी अब समावेशी राजनीति की ओर कदम बढ़ाना चाहती है। सपा के नेताओं का मानना है कि अगर सभी गैर-भाजपा दल एक छतरी के नीचे नहीं आए, तो 2027 की राह उतनी आसान नहीं होगी। सांसद के इस बयान को इसी 'अलर्ट' के तौर पर देखा जा रहा है। इसका सीधा संदेश ये है कि अब अहंकार या पुरानी दुश्मनी की जगह 'जीतने' की रणनीति को अहमियत दी जाएगी।
क्या यूपी में बदलेगा समीकरण?
यूपी की राजनीति में मुस्लिम-यादव समीकरण सपा की रीढ़ रहा है। ओवैसी जैसे नेताओं के सक्रिय होने से यह वोट बैंक डगमगा सकता है। बिहार में कुछ सीटों पर जो खेल हुआ, अखिलेश नहीं चाहते कि वही कहानी मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद या आजमगढ़ में दोहराई जाए। इसीलिए अब वो सभी को साथ जोड़कर एक 'महा-मोर्चा' जैसी तैयारी में जुट सकते हैं।
हालांकि, ओवैसी या अन्य छोटे दल इस पर क्या प्रतिक्रिया देंगे, यह तो समय ही बताएगा। लेकिन एक बात साफ है तेजस्वी की हार ने उत्तर प्रदेश के 'अन्नैया' (अखिलेश) को वक्त रहते सावधान जरूर कर दिया है।
आपकी क्या राय है? क्या सपा और ओवैसी का साथ आना यूपी की राजनीति में गेम चेंजर साबित होगा? या फिर ये गठबंधन जमीन पर काम नहीं कर पाएगा? कमेंट्स में अपनी बात जरूर लिखें।