कुर्सी के लिए भारी बवाल संभल में बैंक चुनाव के दौरान सपा-भाजपा समर्थकों में जमकर धक्का-मुक्की, छावनी बना इलाका
News India Live, Digital Desk: ताज़ा मामला संभल जिले का है, जहाँ 'उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक' के डायरेक्टर पद के लिए नामांकन का काम चल रहा था। सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन देखते ही देखते वहां का नजारा किसी 'सियासी रणभूमि' जैसा हो गया। संभल जो कि अपनी सक्रिय राजनीति के लिए जाना जाता है, वहां बीजेपी (सड़क पर सत्ता पक्ष) और सपा (मुख्य विपक्षी दल) के कार्यकर्ता एक बार फिर आमने-सामने आ गए।
कैसे शुरू हुई बात?
जानकारी के अनुसार, नामांकन प्रक्रिया के दौरान दोनों ही पार्टियों के भारी संख्या में समर्थक इकट्ठा हो गए थे। पहले नारेबाजी शुरू हुई और फिर बात इतनी बढ़ गई कि आपस में धक्का-मुक्की होने लगी। मौके पर मौजूद लोगों का कहना है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी जीत और दबदबे का दावा कर रहे थे। स्थिति तब बिगड़ी जब नामांकन दाखिल करने को लेकर किसी बात पर तू-तू, मैं-मैं हो गई।
छावनी में बदला बैंक परिसर
जब हंगामा काफी बढ़ गया और कार्यकर्ता शांत होने का नाम नहीं ले रहे थे, तो पुलिस को कमान संभालनी पड़ी। हंगामे की सूचना मिलते ही भारी पुलिस फोर्स को वहां तैनात किया गया। अधिकारियों ने काफी मशक्कत के बाद दोनों गुटों को तितर-बितर किया और वहां शांति कायम करने की कोशिश की। नामांकन स्थल के आसपास अब भी भारी फोर्स की तैनाती है ताकि दोबारा कोई अप्रिय घटना न हो।
सिर्फ कुर्सी की जंग नहीं, रसूख का सवाल है!
राजनीतिक पंडितों की मानें तो सहकारी बैंकों का नियंत्रण गांव-देहात की राजनीति और फंडिंग के हिसाब से बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसीलिए कोई भी पार्टी इस मौके को छोड़ना नहीं चाहती। संभल में तो वैसे भी भाजपा और सपा की पुरानी प्रतिद्वंदिता जगजाहिर है, जहाँ हार-जीत सिर्फ वोटों की नहीं बल्कि रसूख की भी मानी जाती है।
आम जनता क्या कहती है?
एक छोटे से बैंक चुनाव में इस कदर तनाव देखकर आम जनता भी थोड़ी परेशान है। लोगों का कहना है कि चुनावी जोश अपनी जगह है, लेकिन नामांकन जैसी सामान्य प्रक्रिया में मारपीट और धक्का-मुक्की शहर के शांति व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है।
फिलहाल नामांकन की प्रक्रिया को पुलिस की देखरेख में पूरा किया जा रहा है, लेकिन संभल की फिजां में जो सियासी गर्माहट पैदा हुई है, उसे शांत होने में थोड़ा वक्त लगेगा।
क्या आपको भी लगता है कि बैंक या कोऑपरेटिव चुनावों में राजनीतिक दलों का इतना हस्तक्षेप सही है? हमें कमेंट्स में जरूर बताएं।