Mahabharata Facts : धृतराष्ट्र के वो 5 पाप जिनकी वजह से नष्ट हुआ कुरुवंश, जानें कैसे हुआ दुर्योधन के पिता का अंत
News India Live, Digital Desk : महाभारत की कथा में धृतराष्ट्र एक ऐसा पात्र है, जिसका पुत्र मोह (Blind Love) पूरे कुरुवंश के विनाश का कारण बना। हालांकि धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे, लेकिन पौराणिक कथाओं के अनुसार, उनकी 'वैचारिक अंधता' और उनके द्वारा किए गए 5 बड़े अपराधों ने न केवल 100 पुत्रों को खोया, बल्कि महाभारत के भीषण युद्ध की नींव भी रखी।
11 मार्च 2026 की इस विशेष रिपोर्ट में आइए जानते हैं धृतराष्ट्र के उन पापों और उनके जीवन के दुखद अंत की कहानी।
धृतराष्ट्र के 5 बड़े पाप (The 5 Sins of Dhritarashtra)
अंधा पुत्र मोह (Extreme Nepotism): धृतराष्ट्र का सबसे बड़ा पाप था अपने पुत्र दुर्योधन की हर गलत बात का समर्थन करना। उन्होंने दुर्योधन की ईर्ष्या और नफरत को कभी नहीं रोका, बल्कि उसे पांडवों के खिलाफ भड़काया।
द्रौपदी का चीरहरण: कुरु सभा में जब कुलवधू द्रौपदी का अपमान हो रहा था, तब धृतराष्ट्र वहां मौजूद थे। एक राजा और ससुर होने के नाते उनके पास शक्ति थी कि वे दुशासन को रोक सकें, लेकिन वे मौन रहे। यह उनका सबसे अक्षम्य अपराध माना जाता है।
न्याय का उल्लंघन: जब युधिष्ठिर को छल से द्यूत क्रीड़ा (जुए) में हराया गया, तब धृतराष्ट्र ने इसे खेल का हिस्सा मानकर पांडवों का राज्य छीनने दिया। उन्होंने धर्मराज के साथ हुए अन्याय पर चुप्पी साधे रखी।
पांडु के प्रति ईर्ष्या: धृतराष्ट्र के मन में हमेशा यह मलाल रहा कि वे बड़े होने के बावजूद अंधे होने के कारण राजा नहीं बन पाए। यही ईर्ष्या बाद में पांडवों के प्रति नफरत में बदल गई।
भीम को मारने का प्रयास: युद्ध खत्म होने के बाद जब पांडव धृतराष्ट्र से मिलने आए, तो उन्होंने भीम को गले लगाने के बहाने अपनी लोहे जैसी भुजाओं से कुचलने की कोशिश की थी। कृष्ण की चतुराई से भीम की जगह लोहे की मूर्ति सामने रखी गई, जिसे धृतराष्ट्र ने चकनाचूर कर दिया था।
कैसे हुआ धृतराष्ट्र का अंत? (The End of Dhritarashtra)
महाभारत युद्ध के 15 साल बाद तक धृतराष्ट्र हस्तिनापुर में ही रहे, लेकिन भीम के तानों से दुखी होकर उन्होंने वन जाने का निर्णय लिया।
सन्यास: उनके साथ गांधारी, कुंती, विदुर और संजय भी वन चले गए। वे हरिद्वार के पास सप्त स्रोत में तपस्या करने लगे।
भयानक दावाग्नि (Forest Fire): एक दिन जंगल में भीषण आग लग गई। धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती उस समय काफी वृद्ध हो चुके थे और भागने में असमर्थ थे।
मृत्यु: उन्होंने भागने के बजाय योग समाधि में बैठने का निर्णय लिया। इसी आग (दावाग्नि) में झुलसकर धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती ने अपने प्राण त्याग दिए। संजय उन्हें छोड़कर हिमालय की ओर चले गए।