ट्रंप की वापसी की आहट और मिडिल ईस्ट की धड़कनें ,जानिए क्यों डरे हुए हैं सऊदी और कतर

Post

News India Live, Digital Desk: दुनिया भर की नज़रें अमेरिका की राजनीति पर टिकी हैं, लेकिन सबसे ज्यादा बेचैनी अगर कहीं है, तो वह है मिडिल ईस्ट यानी मध्य पूर्व में। डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में वापस आ चुके हैं और उनकी इमेज एक ऐसे नेता की है जो कड़े फैसले लेने से नहीं हिचकिचाते। पुरानी कहावत है कि “गेहूं के साथ घुन भी पिसता है”बस यही डर आज सऊदी अरब, कतर और ओमान जैसे देशों को सता रहा है।

आइये, आसान शब्दों में समझते हैं कि अमेरिका और ईरान की तनातनी के बीच ये अमीर अरब देश आखिर शांतिदूत क्यों बन रहे हैं।

पड़ोसी के घर में आग लगेगी, तो आंच यहां भी आएगी

आपको याद होगा, एक समय था जब सऊदी अरब और उसके साथी देश चाहते थे कि अमेरिका ईरान पर लगाम लगाए। लेकिन अब वक्त बदल चुका है। अब यही देश अमेरिका और खासकर ट्रंप की टीम को समझा रहे हैं कि "देखिए, ईरान पर हमला करने की गलती मत कीजिएगा।"

इसकी वजह बहुत साफ और प्रैक्टिकल है। ईरान इन देशों का पड़ोसी है। अगर अमेरिका ने ईरान पर कोई बड़ी स्ट्राइक की या वहां तख्तापलट (Regime Change) की कोशिश की, तो ईरान चुप नहीं बैठेगा। जवाब में ईरान के निशाने पर अमेरिका तो दूर है, लेकिन पास में मौजूद सऊदी, यूएई या कतर के तेल कुएं और शहर सबसे पहले आएंगे। खाड़ी देश यह रिस्क बिल्कुल नहीं लेना चाहते।

सपनों के प्रोजेक्ट और युद्ध का साया

जरा सोचिए, सऊदी अरब अपने 'विजन 2030' के तहत रेगिस्तान में न्यू यॉर्क से भी हाई-टेक शहर बना रहा है। कतर और यूएई बिजनेस और टूरिज्म के हब बन चुके हैं। ऐसे में अगर वहां एक भी मिसाइल गिरती है, तो पूरी इकोनॉमी हिल जाएगी। निवेशक भाग जाएंगे और बरसों की मेहनत मिट्टी में मिल जाएगी।

ये देश अब लड़ाई-झगड़े से आगे निकलकर 'धंधे' यानी अपनी अर्थव्यवस्था पर फोकस कर रहे हैं। इसीलिए, पिछले कुछ समय से सऊदी अरब और ईरान ने अपनी पुरानी दुश्मनी भुलाकर हाथ भी मिलाया है। वो जानते हैं कि तरक्की तभी होगी जब आस-पड़ोस में शांति रहेगी।

पर्दे के पीछे की डिप्लोमेसी

खबरें हैं कि सऊदी अरब, ओमान और कतर के बड़े अधिकारी लगातार ट्रंप और उनकी नई टीम के संपर्क में हैं। उनका मैसेज साफ है— ईरान पर दबाव बनाइए, पाबंदियां लगाइए, लेकिन बात युद्ध तक मत ले जाइए। ओमान तो वैसे भी अमेरिका और ईरान के बीच डाकिया (Mediator) का काम करता आया है, लेकिन इस बार मामला गंभीर है।

यह एक बहुत ही नाजुक मोड़ है। एक तरफ ट्रंप का आक्रामक रवैया है, जिसे दुनिया जानती है। दूसरी तरफ ईरान है, जो झुकने को तैयार नहीं। और इन दोनों के बीच फंसे हैं वो अरब देश, जो बस इतना चाहते हैं कि उनका क्षेत्र जंग का मैदान न बने।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या 'बिजनेसमैन' डोनाल्ड ट्रंप अपने अरब दोस्तों के 'नफा-नुकसान' के गणित को समझते हैं या फिर अपनी पुरानी रणनीति पर ही चलेंगे।