पीली या काली सरसों? जानें आपकी रसोई का यह छोटा सा दाना सेहत का कितना बड़ा खजाना है!

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जब भी 'सरसों' का नाम कानों में पड़ता है, तो मन में सबसे पहले क्या आता है? शायद गरमागरम सरसों का साग और मक्के की रोटी, या फिर दाल में लगता हुआ राई का चटखदार तड़का! सरसों का यह छोटा सा दाना सिर्फ एक मसाला नहीं, बल्कि भारतीय रसोई की आत्मा है। यह हमारी परंपराओं, स्वाद और सेहत की कहानी कहता है।

यह सिर्फ खाने में स्वाद नहीं घोलता, बल्कि सेहत का भी पूरा ध्यान रखता है। इसके अंदर ऐसे गुण छिपे हैं जो पाचन को दुरुस्त रखते हैं, बीमारियों से लड़ने की ताकत देते हैं और शरीर को अंदर से मजबूत बनाते हैं।

समझिए ये दो भाई हैं – एक शांत, दूसरा थोड़ा तीखा

बाजार में सरसों मुख्य रूप से दो रंगों में मिलती है – पीली और काली। दोनों का अपना अलग मिजाज और अलग स्वाद है।

1. पीली सरसों (The Calm One):
यह स्वाद में हल्की और सौम्य होती है। इसका तीखापन बहुत तेज नहीं होता। इसी वजह से उत्तर भारत के खाने, जैसे अचार, चटनी और सब्जियों में इसका खूब इस्तेमाल होता है। इसका तेल भी हल्का होता है और खाने का स्वाद बढ़ा देता है। सेहत की बात करें तो यह विटामिन, मैग्नीशियम और फाइबर का पावरहाउस है, जो पेट को ठीक रखने और शरीर को स्वस्थ बनाने में मदद करता है।

2. काली सरसों या राई (The Fiery One):
यह रंग में गहरी और स्वाद में तेज और चटखदार होती है। जैसे ही गर्म तेल में इसके दाने चटकते हैं, रसोई महक उठती है। दक्षिण भारत और बंगाल के खाने में राई के बिना तड़के की कल्पना भी नहीं की जा सकती। स्वाद के साथ-साथ यह औषधीय गुणों से भी भरपूर है। इसकी तासीर गर्म होती है, जो सर्दियों में शरीर को गर्म रखने, जोड़ों के दर्द और सर्दी-जुकाम में राहत देने का काम करती है।

खेत से लेकर थाली तक का सफर

इन दोनों की खेती भी थोड़ी अलग होती है। पीली सरसों को ठंडे मौसम की जरूरत होती है, जबकि काली सरसों यानी राई लगभग हर तरह के मौसम में उग जाती है। किसान सिर्फ इसके दानों और तेल का ही नहीं, बल्कि इसके फूलों का भी इस्तेमाल करते हैं। सरसों के खेत मधुमक्खी पालन के लिए बेहतरीन माने जाते हैं, जिससे स्वादिष्ट शहद भी मिलता है।

संक्षेप में कहें तो, सरसों का यह छोटा सा दाना हमारी रसोई की एक ऐसी ताकत है जो स्वाद भी देता है और सेहत भी।