School Curriculum : बच्चों को कुछ भी पढ़ा दोगे क्या? NCERT की किताब देख भड़के पूर्व CJI 8वीं कक्षा की पुस्तकें वापस मंगाई गईं
News India Live, Digital Desk : देश की सबसे बड़ी शैक्षणिक संस्था NCERT (नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग) एक बार फिर विवादों के घेरे में है। इस बार विवाद इतना गहरा गया कि भारत के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने किताबों में छपी सामग्री पर अपनी कड़ी नाराजगी जाहिर की है। मामला 8वीं कक्षा की एक किताब से जुड़ा है, जिसे लेकर उठे विवाद के बाद अब उन किताबों को बाजार और स्कूलों से वापस बुलाने (Recall) का आदेश दे दिया गया है।
पूर्व CJI ने जताई आपत्ति: "यह शिक्षा है या कुछ और?"
सूत्रों के मुताबिक, पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने NCERT की 8वीं कक्षा की एक विशेष पुस्तक में दी गई जानकारी और उसके प्रस्तुतीकरण पर सवाल उठाए। उन्होंने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा कि "क्या बच्चों को कुछ भी पढ़ाया जा सकता है?" उनका मानना था कि किताबों में दी गई सामग्री न केवल बच्चों के मानसिक स्तर के अनुरूप नहीं है, बल्कि यह तथ्यात्मक रूप से भी भ्रमित करने वाली हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज भी हुए नाराज
विवाद केवल पूर्व CJI तक सीमित नहीं रहा। सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज जस्टिस सूर्यकांत ने भी इस मामले में अपनी नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान यह मुद्दा उठा, जिसके बाद शिक्षा जगत में हड़कंप मच गया। जजों की इस सख्त टिप्पणी के बाद NCERT प्रशासन तुरंत एक्शन मोड में आ गया।
NCERT का बड़ा फैसला: बाजार से वापस होंगी किताबें
न्यायपालिका की ओर से आई इस कड़ी फटकार के बाद NCERT ने आनन-फानन में 8वीं कक्षा की उन किताबों को वापस मंगवाने का फैसला किया है जिनमें विवादित अंश पाए गए थे।
पुस्तकों की बिक्री पर रोक: फिलहाल इन किताबों की नई बिक्री पर रोक लगा दी गई है।
संशोधन की तैयारी: विशेषज्ञों की एक टीम अब इन पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा करेगी और आपत्तिजनक हिस्सों को हटाकर या संशोधित कर नई पुस्तकें प्रकाशित की जाएंगी।
क्यों उठ रहे हैं बार-बार NCERT पर सवाल?
पिछले कुछ समय से NCERT की किताबों में बदलाव (Rationalization) को लेकर लगातार बहस छिड़ी हुई है। कभी मुगलों के इतिहास को हटाने तो कभी डार्विन की थ्योरी को लेकर विवाद होते रहे हैं। लेकिन इस बार सीधे न्यायपालिका के शीर्ष स्तर से आई आपत्ति ने मामले को बेहद गंभीर बना दिया है। अभिभावकों और शिक्षाविदों का भी मानना है कि बच्चों के पाठ्यक्रम में वैज्ञानिक सोच और सही तथ्यों का होना अनिवार्य है।