कैश कांड के आरोपी जस्टिस यशवंत वर्मा की बढ़ेगी मुश्किल? जांच समिति में बड़ा बदलाव, अब ये दिग्गज करेंगे फैसला
News India Live, Digital Desk : इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और दिल्ली हाईकोर्ट के वर्तमान जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े 'कैश कांड' (Cash Scandal) मामले में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए गठित विशेष 'जांच समिति' (Inquiry Committee) का पुनर्गठन किया है। इस बदलाव के बाद अब नए सदस्यों की देखरेख में मामले की परतों को खंगाला जाएगा।
क्यों बदला गया जांच समिति का स्वरूप?
जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग (Impeachment) जैसी गंभीर प्रक्रिया के तहत यह जांच चल रही है। समिति के पुनर्गठन की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि पूर्व में शामिल कुछ सदस्य या तो सेवानिवृत्त हो चुके थे या अन्य कारणों से उपलब्ध नहीं थे। जांच की निष्पक्षता और गति बनाए रखने के लिए लोकसभा अध्यक्ष ने अब नए कानूनी दिग्गजों को इस पैनल में शामिल किया है।
समिति में कौन-कौन है शामिल?
पुनर्गठित समिति में न्यायपालिका के शीर्ष स्तर के चेहरों को जगह दी गई है:
सुप्रीम कोर्ट के जज: समिति की अध्यक्षता आमतौर पर सर्वोच्च न्यायालय के किसी वरिष्ठ न्यायाधीश द्वारा की जाती है।
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश: पैनल में किसी अन्य हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भी सदस्य के रूप में शामिल किया गया है।
प्रतिष्ठित न्यायविद: कानून के क्षेत्र में गहरी पकड़ रखने वाले एक विशेषज्ञ को भी इस टीम का हिस्सा बनाया गया है।
क्या है पूरा मामला (कैश कांड)?
जस्टिस यशवंत वर्मा पर आरोप है कि उन्होंने न्यायिक पद पर रहते हुए कथित तौर पर अनुचित लाभ लिया। 'कैश फॉर वर्डिक्ट' या भ्रष्टाचार से जुड़े इन आरोपों के बाद उनके खिलाफ महाभियोग चलाने की मांग उठी थी। भारतीय संविधान के अनुसार, किसी जज को पद से हटाने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल होती है और इसके लिए संसद की मंजूरी के साथ-साथ एक न्यायिक समिति द्वारा जांच अनिवार्य होती है।
अब आगे क्या होगा?
नई समिति अब जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे सबूतों, गवाहों और दस्तावेजों का नए सिरे से विश्लेषण करेगी।
रिपोर्ट सौंपना: जांच पूरी होने के बाद समिति अपनी विस्तृत रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंपेगी।
संसद में चर्चा: यदि समिति आरोपों को सही पाती है, तो संसद के दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव पर चर्चा और मतदान हो सकता है।
करियर पर खतरा: अगर आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह भारतीय न्यायिक इतिहास के उन विरल मामलों में से एक होगा जहाँ किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को पद से हटाया जा सकता है।
फिलहाल, इस पुनर्गठन ने कानूनी गलियारों में हलचल तेज कर दी है और सबकी निगाहें अब इस हाई-प्रोफाइल जांच की अगली सुनवाई पर टिकी हैं।