लाल झंडे के बीच क्या खिलेगा कमल? केरल चुनाव के लिए शाह की वो रणनीति जिसने अभी से बढ़ा दी है विरोधियों की टेंशन
News India Live, Digital Desk : भारतीय जनता पार्टी के लिए दक्षिण भारत का द्वार खोलना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है, और इसमें भी 'केरल' एक ऐसा राज्य है जहाँ सालों से मुकाबला सिर्फ दो ताकतोंवामपंथ (LDF) और कांग्रेस (UDF) के बीच सिमटा रहा है। लेकिन हाल के लोकसभा चुनावों में त्रिशूर सीट पर सुरेश गोपी की जीत ने बीजेपी के आत्मविश्वास को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है। अब खुद 'चाणक्य' कहे जाने वाले अमित शाह ने 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए मोर्चा संभाल लिया है।
आखिर क्या है अमित शाह का मास्टर प्लान?
वैसे तो केरल की डगर इतनी आसान नहीं है, लेकिन शाह की रणनीति इस बार कुछ अलग नज़र आ रही है। शाह जानते हैं कि सिर्फ हिंदू वोटों के सहारे केरल जीतना मुमकिन नहीं है। इसीलिए बीजेपी अब केरल के ईसाई समुदाय (Christian Community) के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पिछले कुछ महीनों में पार्टी नेताओं की चर्च और ईसाई धर्मगुरुओं से बढ़ती नजदीकियां इसी 'साइलेंट मिशन' का हिस्सा हैं।
स्थानीय चेहरों पर दांव
शाह का दूसरा बड़ा फोकस स्थानीय लीडरशिप पर है। अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि बीजेपी केरल में 'दिल्ली के नेतृत्व' वाली पार्टी दिखती है। लेकिन अब वे ऐसे स्थानीय चेहरों को आगे ला रहे हैं जो वहां की मिट्टी की भाषा और मुद्दों को समझते हैं। सुरेश गोपी की जीत ने यह साबित कर दिया है कि अगर चेहरा दमदार हो, तो केरल की जनता 'तीसरा विकल्प' चुनने के लिए तैयार है।
वामपंथियों के गढ़ में वार
पिनाराई विजयन सरकार पर भ्रष्टाचार और कुछ अन्य घोटालों के जो आरोप लगे हैं, अमित शाह उसे बड़ा हथियार बनाना चाहते हैं। शाह की टीम ज़मीनी स्तर पर (Booth Level) कार्यकर्ताओं को यह ट्रेनिंग दे रही है कि कैसे इन मुद्दों को लेकर घर-घर पहुँचा जाए। उनका मक़सद सिर्फ चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि वामपंथ की उस पुरानी जड़ को हिलाना है जिसे अभेद्य माना जाता था।
शाह का यह 'मिशन 2026' सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहन सर्वे और रिपोर्ट कार्ड का काम चल रहा है। वह जानते हैं कि केरल में वामपंथ को हराने का मतलब है देश की राजनीति को एक नया संदेश देना।
सच तो ये है कि केरल की राजनीति अब उस मोड़ पर खड़ी है जहाँ मुकाबला दिलचस्प होने वाला है। एक तरफ वामपंथ का कैडर है, दूसरी तरफ कांग्रेस का अपना पुराना वजूद, और इन सबके बीच अमित शाह की अपनी मज़बूत घेराबंदी। देखना यह होगा कि 2026 तक आते-आते यह चुनावी समीकरण क्या मोड़ लेता है। पर इतना तय है कि अमित शाह ने अब केरल में बीजेपी की जीत की पटकथा लिखनी शुरू कर दी है।