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April 26 2026 02:25 am

Anti-Defection Law : क्या बच पाएगी राघव चड्ढा और अन्य सांसदों की कुर्सी? समझिए दल बदल कानून का वो पेच जिसने बदली बाजी

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News India Live, Digital Desk: देश की राजनीति के केंद्र दिल्ली में शुक्रवार को उस वक्त सियासी जलजला आ गया, जब मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (AAP) के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों ने एक साथ बगावत का बिगुल फूंक दिया। पार्टी की आंतरिक कलह और डिप्टी लीडर के पद से हटाए जाने से नाराज राघव चड्ढा ने दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में धमाका करते हुए न केवल पार्टी छोड़ी, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने का भी ऐलान कर दिया। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बीच कार्यकाल में पाला बदलने से इन सांसदों की सदस्यता बचेगी या उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा?

2/3 का जादुई आंकड़ा: कैसे 'सुरक्षित' हैं बागी सांसद?

भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के अनुसार, यदि कोई सांसद या विधायक अपनी मूल पार्टी छोड़ता है, तो उसकी सदस्यता रद्द हो सकती है। लेकिन इस कानून में एक बहुत महत्वपूर्ण अपवाद है।

कानून का प्रावधान: यदि किसी दल के दो-तिहाई (2/3) या उससे अधिक सदस्य एक साथ अलग होकर किसी अन्य दल में विलय (Merge) करते हैं, तो उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होता।

राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट किया कि राज्यसभा में 'आप' के कुल 10 सांसद हैं, जिनमें से 7 (हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, विक्रम साहनी, राजिंदर गुप्ता, संदीप पाठक, अशोक मित्तल और खुद राघव चड्ढा) उनके साथ हैं। यह संख्या कुल सांसदों का 70% है, जो कि 66.6% (दो-तिहाई) की अनिवार्य शर्त को पूरा करती है। इस तकनीकी 'तोड़' के कारण इन सांसदों की सदस्यता पर फिलहाल कोई खतरा नजर नहीं आ रहा है।

सभापति को सौंपा 'हस्ताक्षरित दस्तावेज'

राघव चड्ढा ने बताया कि उन्होंने आज सुबह ही सभी 7 सांसदों के हस्ताक्षरित पत्र राज्यसभा के सभापति को सौंप दिए हैं। कानूनन, यदि सांसदों का यह समूह किसी अन्य दल (भाजपा) में अपने समूह का विलय कर देता है, तो इसे 'दल-बदल' नहीं बल्कि 'पार्टी का विलय' माना जाएगा। ऐसे में न तो उन्हें इस्तीफा देना होगा और न ही उनकी सीट खाली होगी।

1985 से 2003: कितना बदला कानून?

52वां संशोधन (1985): इस कानून का मुख्य उद्देश्य 'आया राम, गया राम' की राजनीति और हॉर्स-ट्रेडिंग को रोकना था। तब प्रावधान था कि 1/3 सदस्यों के अलग होने पर सदस्यता नहीं जाएगी।

91वां संशोधन (2003): अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इसे और सख्त बनाया। अब केवल 1/3 से काम नहीं चलता, बल्कि 2/3 सदस्यों का साथ होना अनिवार्य कर दिया गया। साथ ही, अयोग्य ठहराए गए सदस्यों को मंत्री पद देने पर भी रोक लगा दी गई।

'आप' के लिए बड़ा राजनीतिक झटका

राघव चड्ढा ने कहा, "हमारे पास दो ही विकल्प थे या तो राजनीति छोड़ दें या फिर सकारात्मक राजनीति के लिए अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल करें।" चड्ढा का यह कदम केजरीवाल सरकार के लिए न केवल पंजाब बल्कि दिल्ली में भी बड़ा झटका है, क्योंकि राज्यसभा में पार्टी की ताकत अब सिमट कर केवल 3 सांसदों (संजय सिंह, एन.डी. गुप्ता और सुशील गुप्ता) तक रह जाएगी।