भगवान शिव को क्यों बनना पड़ा त्रिपुरांतक? वह पौराणिक कथा जिसे जानकर आपका शीश नमन से झुक जाएगा
News India Live, Digital Desk : हम सब जानते हैं कि भगवान शिव जितने भोले हैं, समय आने पर उतने ही संहारक भी बन जाते हैं। वैसे तो उनके अनगिनत अवतार और कहानियाँ हमारे ग्रंथों में भरी हुई हैं, लेकिन 'त्रिपुरांतक' अवतार (Tripurantaka Avatar) की बात ही कुछ निराली है। यह कहानी सिर्फ युद्ध की नहीं, बल्कि इस बात की है कि जब इंसान या दानव को अपनी ताकत का घमंड हो जाता है, तो कुदरत और ईश्वर कैसे उसका संतुलन बिगाड़ देते हैं।
आइए आज उस पौराणिक कथा को थोड़ा करीब से महसूस करते हैं, जब पूरी सृष्टि थर-थर कांपने लगी थी।
कौन थे त्रिपुरासुर? (वो तीन दानव भाई)
यह कहानी शुरू होती है ताड़कासुर के तीन पुत्रों से तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली। इन तीनों ने मिलकर ब्रह्मा जी की कड़ी तपस्या की और अमर होने का वरदान मांगा। लेकिन जैसा कि हम जानते हैं, जो पैदा हुआ है उसका मरना तय है, इसलिए उन्हें अमर होने का वरदान तो नहीं मिला, पर एक अनोखी शर्त पर मौत का रास्ता तय हुआ।
उन्हें तीन अजेय पुरियां (शहर) मिलीं: एक सोने की, एक चांदी की और एक लोहे की। ये शहर हमेशा अलग-अलग दिशाओं में घूमते रहते थे और शर्त यह थी कि इन्हें केवल तभी नष्ट किया जा सकता है जब ये तीनों एक सीधी रेखा में आएं और कोई एक ही तीर से तीनों का विनाश कर दे। इसी अजेय होने की ताकत के कारण उन्हें 'त्रिपुरासुर' कहा गया।
जब देवता भी हार मानने लगे
शक्ति का नशा बड़ा बुरा होता है। त्रिपुरासुरों ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया। ऋषि-मुनियों का ध्यान भंग किया जाने लगा और देवताओं को स्वर्ग से बेदखल कर दिया गया। जब इंद्र सहित सभी देवता ब्रह्मा जी और विष्णु जी के पास पहुंचे, तो सबको एक ही बात समझ आई—ये काम सिर्फ और सिर्फ देवाधिदेव महादेव ही कर सकते हैं।
एक अद्भुत रथ और वो अंतिम तीर
महादेव ने त्रिपुरासुरों का वध करने के लिए जो रूप और तैयारी की, वो विज्ञान और चमत्कार का संगम लगती है। देवताओं ने मिलकर शिव जी के लिए एक अलौकिक रथ तैयार किया।
- पृथ्वी उसका रथ बनी।
- सूर्य और चंद्रमा उसके दो पहिए।
- मेरु पर्वत धनुष बना और स्वयं वासुकि नाग की प्रत्यंचा चढ़ाई गई।
- साक्षात भगवान विष्णु उस बाण के अग्रभाग (नोक) बने।
एक तीर और बुराई का अंत
जब वो खास घड़ी आई और अंतरिक्ष में घूमते हुए वो तीनों नगर (सोना, चांदी और लोहा) एक सीधी रेखा में आए, तब महादेव ने अपने धनुष से वह अचूक बाण छोड़ा। उस एक बाण ने तीनों अजेय शहरों को राख के ढेर में बदल दिया। दानवों का घमंड टूटकर गिर पड़ा और देवताओं ने महादेव के 'त्रिपुरांतक' जयकारे से पूरा ब्रह्मांड गूँजा दिया।
हम क्या सीखते हैं इस कहानी से?
यह पौराणिक कथा हमें बताती है कि बुराई के किले कितने भी मज़बूत क्यों न हों—चाहे वो सोने के हों या लोहे के—धैर्य और ईश्वर की शक्ति के आगे वो टिक नहीं सकते। शिव जी का त्रिपुरांतक रूप हमें सिखाता है कि अपने भीतर के काम, क्रोध और लोभ रूपी तीन शहरों (पुरियों) को ज्ञान के एक तीर से कैसे खत्म करना चाहिए।
अगर आज आपके मन में भी कोई बेचैनी या 'अहंकार' का किला है, तो बस एक बार आँखें बंद करके महादेव के इस दिव्य रूप का ध्यान करें... सब कुछ शांत हो जाएगा।