फ्लाइट ने दिया धोखा, तो एस. जयशंकर ने पकड़ा सड़क का रास्ता, न्यूयॉर्क पहुंचने के लिए तय किया 670 किलोमीटर का सफर
News India Live, Digital Desk: जब हम एस. जयशंकर का नाम सुनते हैं, तो जेहन में एक ऐसे मंझे हुए कूटनीतिज्ञ (Diplomat) की तस्वीर आती है जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष पूरी मजबूती से रखता है। लेकिन हाल ही में उन्होंने दिखाया कि वो सिर्फ बातों के ही नहीं, बल्कि एक्शन के भी पक्के हैं।
क्या थी वो बड़ी चुनौती?
दरअसल, जयशंकर को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र (UN) के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से एक बेहद जरूरी मुलाकात करनी थी। इस मीटिंग में दुनिया के ज्वलंत मुद्दों और भारत की भूमिका पर चर्चा होनी थी। लेकिन उस समय अमेरिका में मौसम और कुछ तकनीकी वजहों से विमान सेवाओं पर बुरा असर पड़ा था। कई उड़ानें रद्द हो गई थीं या काफी लेट थीं।
ऐसी स्थिति में कोई भी सामान्य इंसान मीटिंग आगे बढ़ाने का विकल्प चुनता, लेकिन जयशंकर के लिए देश की बात पहले थी।
फ्लाइट की जगह कार का सफर
जब उड़ान मिलना नामुमकिन सा हो गया, तो विदेश मंत्री और उनकी टीम ने हार नहीं मानी। उन्होंने तय किया कि वे सड़क के रास्ते ही न्यूयॉर्क का सफर तय करेंगे। खबर है कि उन्होंने करीब 670 किलोमीटर (लगभग 416 मील) का लंबा सफर कार से तय किया। यह रास्ता छोटा नहीं था, ऊपर से अमेरिका की सड़कों पर घंटों का यह सफर किसी थकान भरे काम से कम नहीं था।
7 घंटे से ज्यादा की इस 'मैराथन रोड ट्रिप' के बाद वे न्यूयॉर्क पहुंचे और अपनी तय मीटिंग को पूरा किया। यह खबर जैसे ही बाहर आई, सोशल मीडिया पर लोग इसे जयशंकर की 'डेडिकेशन' से जोड़कर देखने लगे।
इतना जरूरी क्यों था यह सफर?
ये सिर्फ एक मुलाकात नहीं थी। मौजूदा वैश्विक स्थितियों में, जहां दुनिया के कई हिस्सों में तनाव का माहौल है, भारत की आवाज बहुत मायने रखती है। जयशंकर का वहां पहुंचना यह साफ संदेश देता है कि भारत दुनिया की समस्याओं को सुलझाने के लिए कितना गंभीर है और वो किसी भी प्रोटोकॉल या सुविधा के लिए अपने कर्तव्यों से पीछे नहीं हटता।
कहानी जो सबको प्रेरित करती है
आजकल की भागदौड़ भरी दुनिया में हम अक्सर छोटे-छोटे कारणों से अपने काम टाल देते हैं। लेकिन देश के एक वरिष्ठ मंत्री का 670 किलोमीटर का सड़क मार्ग से सफर तय करना हमें सिखाता है कि अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और मन में उसे पूरा करने की ठान ली जाए, तो कोई भी रुकावट बड़ी नहीं होती।
वाकई, यह कहानी आने वाले कई सालों तक भारतीय डिप्लोमेसी की 'जुनून' वाली कहानियों में शुमार रहेगी।