शाह के ऑफिस के बाहर टीएमसी का दांव, जब सियासी रार में पुलिस और सांसदों के बीच हुई तीखी नोकझोंक
News India Live, Digital Desk: भारत की राजनीति में आजकल एक पैटर्न सा बन गया है जब बातचीत से रास्ता नहीं निकलता, तो धरना ही आखिरी हथियार बचता है। कुछ ऐसा ही नजारा दिल्ली में देखने को मिला। तृणमूल कांग्रेस के 8 सांसद, जिनमें प्रमुख चेहरे शामिल थे, अपनी मांगों को लेकर गृह मंत्री अमित शाह के दफ्तर के बाहर बैठ गए।
बात कहाँ बिगड़ी?
टीएमसी का आरोप पुराना है लेकिन मुद्दा गंभीर। सांसदों का कहना है कि पश्चिम बंगाल के साथ 'सौतेला' व्यवहार किया जा रहा है। मनरेगा (MGNREGA) के फंड से लेकर गरीबों के लिए बनाए जाने वाले 'आवास योजना' के पैसों तक, टीएमसी का दावा है कि केंद्र सरकार करोड़ों रुपये दबाए बैठी है। सांसदों का कहना था कि जब तक गृह मंत्री खुद इस मुद्दे पर बात नहीं करेंगे या संतोषजनक जवाब नहीं मिलेगा, वे वहाँ से नहीं हटेंगे।
पुलिस, प्रोटोकॉल और तकरार
गृह मंत्रालय का इलाका हाई-सिक्योरिटी ज़ोन है। वहां सांसदों का इस तरह धरना देना पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के लिए सिरदर्द बन गया। मौके पर काफी गहमागहमी हुई। नारेबाजी की आवाजें सीधे मंत्रालय की गलियारों तक पहुँचीं। टीएमसी का सीधा स्टैंड था कि वे बंगाल के हक की लड़ाई के लिए यहाँ आए हैं और वे सिर्फ एक अप्वाइंटमेंट चाहते थे, लेकिन उन्हें वह नहीं मिला।
राजनीति या असली मजबूरी?
इस पूरे ड्रामे को दो नजरियों से देखा जा सकता है। बीजेपी इसे 'पॉलिटिकल स्टंट' करार दे रही है, उनका कहना है कि बंगाल सरकार ने फंड्स का सही हिसाब नहीं दिया। दूसरी तरफ, ममता बनर्जी और उनकी पार्टी का तर्क है कि आम जनता के काम रुके हुए हैं।
आम जनता पर इसका क्या असर?
आम आदमी इस राजनीति को देखते हुए अक्सर ये सोचता है कि आखिर 'आम लोगों का फंड' पार्टियों की लड़ाई का जरिया क्यों बन जाता है? दिल्ली की सड़कों पर बैठे ये सांसद अपनी पार्टी के लिए ताकत बटोर रहे हैं या बंगाल के मज़दूरों के लिए, ये आने वाले वक्त में फंड्स के जारी होने (या न होने) से ही पता चलेगा।
फिलहाल, ये धरना खत्म जरूर हो गया होगा, लेकिन बंगाल बनाम केंद्र की ये आग बुझने वाली नहीं दिखती। यह तस्वीर इस बात की गवाह है कि आने वाले चुनावों में भी ये 'पैसे और हक' की लड़ाई सबसे बड़ा मुद्दा रहने वाली है।