जब सुप्रीम कोर्ट में गूँजा कसाब का नाम,आवारा कुत्तों के विवाद पर जस्टिस सूर्यकांत ने मेनका गांधी को क्यों लताड़ा?
News India Live, Digital Desk : भारत की गलियों में आजकल एक अघोषित डर घूम रहा है'आवारा कुत्ते'। कभी किसी पार्क में खेलते बच्चे को नोच लिया जाता है, तो कभी सुबह की सैर पर निकले बुजुर्ग लहूलुहान हो जाते हैं। यह मसला जब सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुँचा, तो सुनवाई के दौरान कुछ ऐसी बातें हुईं जिन्होंने हर किसी को चौंका दिया। भविष्य के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बनने वाले जस्टिस सूर्यकांत ने इस दौरान मेनका गांधी के पुराने बयानों और 'अजमल कसाब' का उदाहरण देकर सख्त लहजे में कुछ सवाल पूछे।
दरअसल, मामला आवारा कुत्तों के आतंक से जुड़ा था। कोर्ट में उस समय सन्नाटा पसर गया जब जस्टिस सूर्यकांत ने मेनका गांधी (जो पशु अधिकारों के लिए जानी जाती हैं) के एक वायरल वीडियो या बयानों का ज़िक्र किया। खबर है कि उन्होंने नाराजगी जताते हुए पूछा कि पशु अधिकारों की वकालत करने वाले लोग उन आम इंसानों की पीड़ा को क्यों नहीं समझते जो कुत्तों के हमलों का शिकार हो रहे हैं।
जस्टिस सूर्यकांत ने 'कसाब' का नाम क्यों लिया?
यहाँ सबसे बड़ी चर्चा उस उदाहरण की हो रही है जो जस्टिस सूर्यकांत ने दिया। उन्होंने कसाब का नाम लेते हुए समझाया कि हर जीव के पास अपनी सहज प्रवृत्ति (Instinct) होती है। जज साहब का इशारा था कि जैसे कसाब की अपनी एक फितरत थी और उसकी फितरत से कितनी तबाही हुई, वैसे ही कुत्तों की भी अपनी प्रवृत्ति होती है। कानून को यह तय करना होगा कि पशुओं के अधिकार इंसानी जान की कीमत पर तो नहीं खड़े हैं?
कोर्ट का साफ़ मानना है कि कोई भी अधिकारी या समाजसेवी किसी आम आदमी को सिर्फ इसलिए अपमानित या गाली नहीं दे सकता क्योंकि वह आवारा कुत्तों के हमले से परेशान है और अपनी शिकायत लेकर पहुंचा है। यह इशारा सीधे तौर पर मेनका गांधी के उन कथित कॉल रिकॉर्डिंग्स की तरफ था, जहाँ उन्होंने कथित रूप से कुत्तों के मामले में शिकायत करने वालों को खरी-खोटी सुनाई थी।
आम जनता का पक्ष क्या है?
देखा जाए तो यह लड़ाई पशु प्रेम बनाम लोक सुरक्षा की है। सुप्रीम कोर्ट में जिस तीखी चर्चा को हमने देखा, वह दर्शाती है कि कानून भी अब महसूस कर रहा है कि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो रही है। जजों का तर्क बिल्कुल सीधा था 'पशु अधिकार होने चाहिए, लेकिन नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि है।'
आज के दौर में जब कुत्तों के हमलों की खबरें हर रोज़ अखबारों की सुर्खियाँ बनती हैं, सुप्रीम कोर्ट का यह रुख लोगों के लिए एक बड़ी राहत जैसा है। अब सवाल यह है कि क्या मेनका गांधी और पशु अधिकार संगठन इस टिप्पणी के बाद अपना रुख बदलेंगे? या फिर गलियों में इसी तरह खौफ का माहौल बना रहेगा?