तमिलनाडु विधानसभा में आर-पार की जंग, गवर्नर आरएन रवि और स्टालिन के बीच वो क्या था जिसने वॉकआउट की नौबत ला दी
News India Live, Digital Desk: जब भी विधानसभा का सत्र शुरू होता है, तो एक गरिमा होती है, एक मर्यादा होती है। लेकिन तमिलनाडु विधानसभा के हालिया सत्र में माहौल बिल्कुल अलग था। जैसे ही खबर आई कि गवर्नर आरएन रवि राष्ट्रगान होने से पहले ही सदन से बाहर निकल गए, लोग चौंक गए। आमतौर पर राष्ट्रगान का सम्मान सबसे ऊपर रखा जाता है, तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति इतना बड़ा कदम उठाने पर मजबूर हुआ?
बात केवल राष्ट्रगान की नहीं थी
राजभवन (Lok Bhavan) ने साफ कर दिया है कि राष्ट्रगान तो बस आखिरी ट्रिगर पॉइंट था। असल में 13 ऐसी वजहें थीं जो काफी समय से सरकार और राज्यपाल के रिश्तों में कड़वाहट घोल रही थीं।
- अभिभाषण में काट-छांट: राज्यपाल का कहना है कि सरकार द्वारा तैयार किए गए भाषण में ऐसी कई बातें थीं जो तथ्यों से परे थीं और जिन्हें पढ़ना एक संवैधानिक प्रमुख के तौर पर उनके लिए मुमकिन नहीं था।
- संवैधानिक प्रोटोकॉल का उल्लंघन: आरोप है कि राज्य सरकार राज्यपाल की मौजूदगी में ही ऐसे प्रस्ताव लाने की कोशिश करती है जो नियमों के खिलाफ हैं।
- सरकारी अमले का बर्ताव: राजभवन ने अपनी लिस्ट में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और उनके मंत्रियों के आचरण पर भी सवाल उठाए हैं। कहा गया कि सदन के भीतर राज्यपाल को वो सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे।
- इडेयोलॉजी का टकराव: राष्ट्रवाद और राज्य की नीतियों के बीच जो लकीर खींची गई है, वह अब सीधे टकराव में बदल गई है।
धुंध में छिपे वो असली मुद्दे
दरअसल, यह पूरा मामला एक बड़ी राजनीतिक लड़ाई की ओर इशारा करता है। राजभवन का तर्क है कि सरकार सदन की कार्यवाही का इस्तेमाल केवल राजनीतिक रोटियां सेंकने और राज्यपाल को अपमानित करने के लिए कर रही है। जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तब गवर्नर ने वहां से बाहर निकलना बेहतर समझा।
अब आगे क्या?
एक आम नागरिक के मन में यह सवाल ज़रूर होगा कि अगर सरकार और राज्यपाल इसी तरह आपस में उलझते रहेंगे, तो राज्य के काम कैसे होंगे? विधानसभा में ऐसी खींचतान लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं मानी जाती। 13 बिंदुओं वाली यह लिस्ट इस बात का सबूत है कि फिलहाल दोनों पक्षों में 'युद्ध विराम' की कोई संभावना नहीं दिख रही है।