आरजेडी का प्लान-बी क्या है? तेजस्वी, तेज प्रताप और लालू के बिना कौन थामेगा पार्टी की कमान?

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News India Live, Digital Desk : बिहार की राजनीति में इन दिनों एक सवाल हर किसी के जहन में कौंध रहा है "आगे क्या?" बिहार की सबसे बड़ी पार्टियों में से एक राष्ट्रीय जनता दल (RJD) इस समय अपने सबसे कठिन कानूनी दौर से गुज़र रही है। 'लैंड फॉर जॉब' (Land for Job) मामले की तपिश अब केवल लालू यादव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, तेज प्रताप, मीसा भारती और हेमा यादव तक का नाम शामिल है।

अब बड़ा सवाल ये है कि अगर कोर्ट का फैसला उम्मीद के उलट आया और ट्रायल के बाद परिवार के इन मुख्य चेहरों को सजा हो जाती है, तो राजद का जहाज कौन चलाएगा? क्या पार्टी बिखर जाएगी या लालू यादव ने परदे के पीछे कोई 'प्लान-बी' तैयार कर रखा है?

1. क्या कोई बाहरी 'विश्वस्त' संभालेगा कमान?

अगर पूरा परिवार कानूनी पचड़ों में फंसता है, तो लालू यादव के सबसे भरोसेमंद सिपाहियों के नाम आगे आते हैं। इनमें सबसे पहला नाम जगदानंद सिंह का है, जो फिलहाल प्रदेश अध्यक्ष हैं। लेकिन उनकी उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए क्या वे लंबी रेस के घोड़े साबित होंगे?
दूसरा बड़ा चेहरा अब्दुल बारी सिद्दीकी का है। सिद्दीकी साहब पार्टी का पुराना और साफ़-सुथरा मुस्लिम चेहरा हैं। एम-वाई (M-Y) समीकरण को साधे रखने के लिए वे एक बेहतरीन विकल्प हो सकते हैं।

2. क्या राजश्री यादव (तेजस्वी की पत्नी) होंगी 'नया चेहरा'?

राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा भी तेज़ है कि जैसे संकट के समय लालू जी ने राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाकर सबको चौंका दिया था, वैसा ही कुछ फिर से हो सकता है। तेजस्वी यादव की पत्नी राजश्री यादव को अब तक राजनीति से दूर रखा गया है, लेकिन वे एक पढ़ी-लिखी और सुलझी हुई महिला के तौर पर देखी जाती हैं। अगर परिवार पर आंच आती है, तो कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाए रखने के लिए 'घर की बहू' को आगे लाना सबसे सुरक्षित दांव हो सकता है।

3. विधायकों के टूटने का डर

हकीकत तो ये है कि राजद एक ऐसी पार्टी है जो लालू और तेजस्वी के करिश्मे पर टिकी है। अगर ये दोनों ही सक्रिय राजनीति से दूर होते हैं, तो 78 विधायकों वाली इस पार्टी में सेंध लगाना विरोधियों के लिए आसान हो जाएगा। नीतीश कुमार और बीजेपी की नजर हमेशा इस मौके पर रहेगी। बिना 'लालू सरनेम' के विधायकों को एक साथ बांधकर रखना किसी भी 'गैर-यादव' या 'बाहरी' नेता के लिए लोहे के चने चबाने जैसा होगा।

4. पार्टी का वजूद और कार्यकर्ता

राजद का बेस वोट (Core Voter) यानी यादव और मुस्लिम समाज हमेशा से लालू परिवार के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा रहा है। अगर कानूनी कार्रवाई को 'राजनीतिक साजिश' बताकर पेश किया गया, तो जनता में सहानुभूति की लहर भी पैदा हो सकती है। ऐसी स्थिति में जो भी नया नेता बनेगा, उसे 'लालू के संदेशवाहक' के रूप में खुद को पेश करना होगा।