लैंड फॉर जॉब केस ,क्या लालू परिवार ने सच में रेलवे को क्रिमिनल इंटरप्राइज बना दिया था?

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News India Live, Digital Desk : बिहार की सियासत और 'कानून का हाथ' जब टकराते हैं, तो कुछ ऐसी खबरें निकलकर आती हैं जो न केवल सुर्खियों में रहती हैं, बल्कि लोकतंत्र के सिस्टम पर भी सवाल खड़ा करती हैं। आजकल चर्चा में है 'लैंड फॉर जॉब' (Land for Job) घोटाला और इस पर आई CBI के स्पेशल जज की वो कड़ी टिप्पणी, जिसने लालू यादव के परिवार को मुश्किलों के घेरे में खड़ा कर दिया है।

राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप तो चलते रहते हैं, लेकिन जब अदालत के भीतर से यह आवाज आए कि किसी सरकारी विभाग को "निजी जागीर" (Personal Fiefdom) की तरह इस्तेमाल किया गया, तो बात गंभीर हो जाती है। आइए समझते हैं कि जज साहब ने ऐसा क्यों कहा और इसके पीछे की असली कहानी क्या है।

क्या है यह 'पर्सनल जागीर' और 'क्रिमिनल इंटरप्राइज' का मामला?

CBI की विशेष अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए साफ़ कहा कि जिस तरह से रेलवे में नियुक्तियाँ की गईं, वह कोई आम प्रशासनिक गलती नहीं थी। जज के शब्दों में, यह एक ऐसा "क्रिमिनल इंटरप्राइज" (अपराधिक साम्राज्य) खड़ा करने जैसा था, जहाँ पूरी व्यवस्था का ही दुरुपयोग कर लिया गया।

आरोप है कि जब लालू यादव रेल मंत्री थे, तब उन्होंने ग्रुप-D की भर्तियों में ऐसे लोगों को जगह दी जिन्होंने बदले में अपनी पुश्तैनी जमीन लालू परिवार के सदस्यों के नाम कर दी। कोर्ट की नज़र में यह सिर्फ़ एक भ्रष्टाचार का मामला नहीं है, बल्कि देश के एक प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान (भारतीय रेलवे) को अपने घर की खेती की तरह चलाने का प्रयास है।

जज की नाराजगी की असली वजह

अदालत का मानना है कि नियम-कायदों को पूरी तरह ताक पर रख दिया गया था।

  • सीधे जमीन का खेल: न विज्ञापन, न मेरिट—बस जमीन रजिस्ट्री हुई और नौकरी मिल गई।
  • पारदर्शिता का अभाव: जो पद हज़ारों-लाखों युवाओं के हक के थे, उन्हें निजी लेन-देन के लिए इस्तेमाल किया गया।

जज ने साफ़ तौर पर यह भी इंगित किया कि किसी ऊंचे पद पर बैठकर ऐसी कार्यशैली अपनाना पद की गरिमा और संवैधानिक मर्यादा के साथ बड़ा खिलवाड़ है।

क्या यह बिहार की राजनीति को बदल देगा?

बिहार में इस खबर के आने के बाद जुबानी जंग तेज़ हो गई है। एनडीए खेमा इसे "सच की जीत" बता रहा है, तो आरजेडी समर्थक इसे "विपक्षी नेताओं को दबाने की साजिश" कह रहे हैं। लेकिन कानून के पन्नों में जो दर्ज हुआ है, उसे भुलाना इतना आसान नहीं है। तेजस्वी यादव, मीसा भारती और लालू प्रसाद यादव—इन सबके लिए कानूनी डगर अब काफी पथरीली हो गई है।

सबसे बड़ी बात ये है कि यह मामला अब केवल ट्रायल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कोर्ट की ये टिप्पणियाँ 'पब्लिक ओपिनियन' (जनता की राय) को भी प्रभावित कर रही हैं। आम युवा, जो रेलवे की परीक्षा के लिए दिन-रात मेहनत करता है, उसके लिए "नौकरी के बदले जमीन" का यह नेटवर्क एक बहुत बड़ा धक्का है।

आगे क्या?

अदालत ने जिस कड़ाई से "क्रिमिनल साम्राज्य" शब्द का इस्तेमाल किया है, उससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि आने वाली सुनवाई लालू परिवार के लिए सुखद नहीं रहने वाली है। जैसे-जैसे गवाहियां और सुबूत सामने आएंगे, यह 'पैंडोरा बॉक्स' (पिटारा) और भी रहस्य खोलेगा।

अब देखना दिलचस्प होगा कि आरजेडी का नेतृत्व इन सख्त कानूनी प्रहारों से कैसे उबरता है। एक बात तो साफ़ है—भारतीय रेलवे देश की संपत्ति है, और किसी की भी 'जागीर' होने का टैग इस संस्थान की साख पर गहरा घाव छोड़ जाता है।

आप इस पूरी खबर को कैसे देखते हैं? क्या कोर्ट के शब्दों ने बिहार की जनता की भावना को व्यक्त किया है? हमें कमेंट में ज़रूर बताएं।