Village Politics : यूपी में प्रधानी की जंग अब नहीं आसान, चुनाव से पहले प्रधानों के सामने खड़ी हुईं ये 3 बड़ी चुनौतियां
News India Live, Digital Desk: Village Politics : उत्तर प्रदेश में जैसे-जैसे पंचायत चुनाव का समय नजदीक आ रहा है, गांवों की गलियों में सियासी माहौल गरमाने लगा है. मौजूदा ग्राम प्रधान जहां अपनी कुर्सी बचाने के लिए आखिरी साल में विकास कार्यों को गति देने में जुटे हैं, वहीं नए दावेदार भी अपनी-अपनी गोटी सेट करने में लग गए हैं. लेकिन इस बार प्रधानी का ताज पहनना या उसे बचाए रखना उतना आसान नहीं होगा. चुनाव से पहले ही मौजूदा और भावी प्रधानों के सामने तीन ऐसी बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं जो उनका सिरदर्द बनी हुई हैं.
गांव की सरकार का मुखिया यानी ग्राम प्रधान दिखने में भले ही एक छोटा पद लगे, लेकिन उसके पास लाखों-करोड़ों के विकास कार्यों का जिम्मा होता है. यही वजह है कि चुनाव नजदीक आते ही सरकार से लेकर प्रशासन तक की नजरें उन पर टिक जाती हैं और नियमों का शिकंजा कसना शुरू हो जाता है.
1. आरक्षण का 'चक्रव्यूह'
पंचायत चुनाव से पहले हर प्रधान और दावेदार के लिए सबसे बड़ा सवाल और सबसे बड़ा डर 'आरक्षण' होता है. कार्यकाल पूरा होने तक किसी को यह पता नहीं होता कि अगली बार उनकी सीट सामान्य रहेगी, महिला के लिए आरक्षित होगी या फिर किसी और जाति के लिए. आरक्षण की व्यवस्था रोटेशन (चक्रानुक्रम) के आधार पर तय होती है.[1] इस वजह से कई दिग्गज और मौजूदा प्रधान, जो पांच साल से अपनी जमीन तैयार कर रहे होते हैं, वे आरक्षण के एक ही फैसले से चुनाव की दौड़ से बाहर हो जाते हैं. आजकल गांव की चौपालों पर सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि "अबकी सीट किसकी होगी?" इस अनिश्चितता ने सभी की सांसें अटका रखी हैं.
2. वित्तीय जांच और अधिकारों पर 'कैंची'
चुनाव से ठीक पहले पंचायती राज विभाग और जिला प्रशासन, ग्राम प्रधानों द्वारा कराए गए विकास कार्यों और खर्च की गई रकम की जांच तेज कर देते हैं. छोटी-छोटी शिकायतों को भी गंभीरता से लिया जाने लगता है. हाल ही में पंचायती राज विभाग ने एक पुराने आदेश को रद्द करते हुए यह नियम फिर से लागू कर दिया है कि किसी भी प्रधान के खिलाफ अब कोई भी व्यक्ति सीधे डीएम या शासन से शिकायत कर सकता है, चाहे वह उस गांव का निवासी हो या न हो.[2] इस फैसले से प्रधानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं, क्योंकि चुनावी रंजिश में झूठी शिकायतें बढ़ने का अंदेशा है. जांच में दोषी पाए जाने पर वित्तीय अधिकार सीज होने से लेकर उम्मीदवारी रद्द होने तक का खतरा बना रहता है.
3. 'प्रधान पति' कल्चर पर सरकार की सख्ती
उत्तर प्रदेश की ग्रामीण राजनीति में 'प्रधान पति' एक बड़ा मुद्दा रहा है. अक्सर देखा जाता है कि महिला सीट होने पर पत्नी चुनाव जीतती है, लेकिन प्रधानी का सारा काम और बैठकों में हिस्सा उनके पति ही लेते हैं. पिछले कुछ समय से सरकार इस कल्चर को लेकर काफी सख्त हो गई है. अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश हैं कि महिला प्रधानों से ही सीधे बात की जाए और सरकारी बैठकों में उनके किसी पुरुष रिश्तेदार को शामिल न होने दिया जाए. चुनाव से पहले इस नियम को और कड़ाई से लागू किया जा रहा है, जिससे उन लोगों को परेशानी हो रही है जो अपनी पत्नी को सिर्फ चेहरा बनाकर खुद प्रधानी चलाना चाहते हैं.
कुल मिलाकर, आने वाले दिन यूपी की ग्रामीण राजनीति के लिए बेहद अहम होने वाले हैं. आरक्षण की तलवार, जांच का डर और बदलते नियम मौजूदा प्रधानों और नए दावेदारों, दोनों के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं हैं.