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April 08 2026 09:53 am

Varuthini Ekadashi 2026: 10 हजार साल की तपस्या के बराबर है यह व्रत, जानें 13 अप्रैल को वरुथिनी एकादशी का शुभ मुहूर्त और जरूरी नियम

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धर्म डेस्क | हिंदू धर्म में वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का विशेष महत्व है, जिसे वरुथिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह एकादशी सौभाग्य प्रदान करने वाली और समस्त पापों का नाश करने वाली है। शास्त्रों में वर्णित है कि वरुथिनी एकादशी का व्रत करने से साधक को कन्यादान के समान पुण्य और 10,000 वर्षों की कठिन तपस्या के बराबर फल प्राप्त होता है। इस वर्ष यह पवित्र व्रत 13 अप्रैल 2026, सोमवार को रखा जाएगा।

वरुथिनी एकादशी 2026: तिथि और पारण का सटीक समय

पंचांग के अनुसार, वैशाख कृष्ण एकादशी तिथि की शुरुआत 13 अप्रैल 2026 को रात 01:16 बजे होगी और इसका समापन 14 अप्रैल को रात 01:08 बजे होगा। उदयातिथि के महत्व को देखते हुए 13 अप्रैल को ही व्रत रखा जाएगा। व्रत का पारण (व्रत खोलना) 14 अप्रैल, मंगलवार को सुबह 06:54 बजे से 08:31 बजे के बीच करना अति शुभ रहेगा। पारण के समय में चूक होने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है।

24 घंटे पहले से शुरू हो जाते हैं नियम: भूलकर भी न करें ये गलतियां

वरुथिनी एकादशी का व्रत अन्य एकादशियों की तुलना में अधिक कठिन माना जाता है। ज्योतिषियों के अनुसार, व्रत के नियम 12 अप्रैल (दशमी तिथि) की सुबह से ही शुरू हो जाते हैं। इस दौरान प्याज, लहसुन, शलजम और बैंगन जैसी तामसिक सब्जियों का सेवन पूरी तरह वर्जित है। इसके साथ ही मांस, मदिरा, तंबाकू और अन्य मादक पदार्थों से दूरी बनाए रखना अनिवार्य है। दशमी की रात को कांसे के बर्तन में भोजन करना और शहद का सेवन भी वर्जित बताया गया है।

इन कार्यों से नाराज हो सकते हैं भगवान विष्णु

शास्त्रों के अनुसार, एकादशी केवल शारीरिक उपवास नहीं बल्कि मानसिक शुद्धता का भी पर्व है। इस दिन साधक को अपने मन में किसी के प्रति ईर्ष्या, क्रोध या नकारात्मक भाव नहीं लाने चाहिए। दूसरों की निंदा करना या झूठ बोलना व्रत के पुण्य को समाप्त कर देता है। मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति जाने-अनजाने में भी इस दिन वर्जित पदार्थों का सेवन करता है, तो उसे व्रत का विपरीत फल भोगना पड़ सकता है, जिसका समाधान मिलना भी कठिन होता है।

वरुथिनी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व

भविष्य पुराण में उल्लेख है कि जो व्यक्ति वरुथिनी एकादशी का विधिवत पालन करता है, वह इस लोक में सुख भोगकर अंत में विष्णु लोक को प्राप्त करता है। इस दिन भगवान विष्णु के 'मधुसूदन' स्वरूप की पूजा की जाती है। इस दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है, खासकर प्यासे को जल पिलाना और अन्न दान करना महापुण्यदायक माना गया है।