इलाहाबाद हाईकोर्ट में यूपी DGP तलब: पुलिस की लचर जांच और कोर्ट आदेशों की अनदेखी पर भड़के जस्टिस समीर जैन, जानें कोर्ट रूम में क्या हुआ

इलाहाबाद हाईकोर्ट में यूपी DGP तलब: पुलिस की लचर जांच और कोर्ट आदेशों की अनदेखी पर भड़के जस्टिस समीर जैन, जानें कोर्ट रूम में क्या हुआ

उत्तर प्रदेश में पुलिस जांच की गिरती गुणवत्ता, केस डायरी और निर्देशों को अदालत में पेश करने में होने वाली अत्यधिक देरी तथा अदालती आदेशों की लगातार हो रही अनदेखी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद तल्ख रुख अपनाया है। हाईकोर्ट के जस्टिस समीर जैन की एकल पीठ ने मामले को अत्यंत गंभीर मानते हुए उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) राजीव कृष्णा को व्यक्तिगत रूप से अदालत में तलब किया। मंगलवार को अदालत में उपस्थित हुए डीजीपी से पीठ ने सीधे तौर पर जवाब-तलब किया कि आखिर राज्य के पुलिस अधिकारी न्यायिक आदेशों का पालन करने में बार-बार आनाकानी और अनिच्छा क्यों दिखाते हैं। अदालत ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि पुलिस तंत्र की इस शिथिलता और दूषित कार्यशैली के कारण हत्या जैसे गंभीर मामलों में भी आरोपियों की जमानत अर्जियां महीनों तक अदालतों में बेवजह लटकी रहती हैं, जिससे नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सीधा हनन होता है।

जस्टिस समीर जैन की तल्ख टिप्पणी: यह केवल एक केस नहीं, व्यवस्थागत सड़ांध का मामला है

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, सुनवाई के दौरान जस्टिस समीर जैन ने डीजीपी को स्पष्ट किया कि यह मामला सिर्फ उसी एक याचिका तक सीमित नहीं है, जिसके चलते उन्हें समन जारी किया गया था। पीठ ने कहा कि लगभग हर दैनिक सुनवाई में यह देखने को मिलता है कि अदालत द्वारा समयसीमा तय किए जाने के बावजूद पुलिस अधिकारी न तो समय पर निर्देश भेजते हैं और न ही आवश्यक रिकॉर्ड्स कोर्ट के समक्ष पेश करते हैं। पीठ ने टिप्पणी की कि कई आपराधिक मामलों में जांच बहुत ही लचर, पक्षपातपूर्ण और भ्रष्ट तरीके से की जाती है। अदालत ने डीजीपी को याद दिलाया कि पूरे राज्य की पुलिस फोर्स के मुखिया होने के नाते यह उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है कि प्रदेश भर में निष्पक्ष, पारदर्शी और त्रुटिहीन जांच सुनिश्चित की जाए।

कन्विक्शन रेट के दावों पर कोर्ट का तीखा सवाल: हम गड़बड़ जांचों की जमीनी हकीकत जानते हैं

अदालत द्वारा उठाए गए सवालों के जवाब में डीजीपी राजीव कृष्णा ने राज्य में पुलिस की दोषसिद्धि दर (Conviction Rate) में आए सुधार के आंकड़े पेश करने की कोशिश की। हालांकि, जस्टिस समीर जैन ने इन आंकड़ों को खारिज करते हुए बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि कनविक्शन रेट के आंकड़े अदालत की इन बुनियादी चिंताओं का समाधान नहीं हो सकते।

जस्टिस जैन ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, "आप दोषसिद्धि दर के बारे में बात कर रहे हैं, जबकि हम यहां रोज अदालतों में गड़बड़ और दूषित जांचों से निपटते हैं। आप जिन आंकड़ों का जिक्र कर रहे हैं, उनका जमीनी स्तर पर क्या मतलब है? हम हाईकोर्ट के न्यायाधीश होने के नाते थानों और जांच अधिकारियों की असल सच्चाई को बहुत अच्छी तरह जानते हैं।"

हलफनामे में सब कुछ, लेकिन गायब हो जाती है सीसीटीवी फुटेज

सुनवाई के दौरान अदालत ने डिजिटल साक्ष्यों, विशेषकर अपराध स्थल और पुलिस कार्रवाई से जुड़ी सीसीटीवी फुटेज को गायब करने या समय पर पेश न करने की पुलिस की प्रवृत्ति पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में पुलिस के हलफनामों और केस डायरी में सब कुछ दर्ज होता है और फुटेज का दावा किया जाता है, लेकिन जब वास्तविक रूप से अदालत उन डिजिटल रिकॉर्ड्स और सीसीटीवी फुटेज की मांग करती है, तो संबंधित जांच अधिकारी कोई न कोई बहाना बनाकर फुटेज न मिलने की बात कह देते हैं। अदालत ने कहा कि वैज्ञानिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को अदालत से छिपाना अथवा समय पर पेश न करना न्याय के पहिये को रोकने के समान है।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता और 3 दिन का नियम: डीजीपी से पूछा रोडमैप

व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) से जुड़े मामलों में पुलिस की लेटलतीफी का हवाला देते हुए जस्टिस समीर जैन ने कहा कि पहले जमानत याचिकाओं पर पुलिस को निर्देश मंगाने के लिए 10 दिनों का समय दिया जाता था। हालांकि, अब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में निर्देश पेश करने के लिए अधिकतम 3 दिन का समय ही पर्याप्त है। पीठ ने डीजीपी से तीखा सवाल पूछा कि वे यह कैसे सुनिश्चित करेंगे कि अधीनस्थ पुलिस अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के इस 3 दिन के नियम का कड़ाई से पालन करें और सभी आवश्यक निर्देश व रिकॉर्ड्स तय समय पर अदालत की मेज पर पहुंच जाएं। इसके जवाब में डीजीपी ने अदालत को आश्वस्त किया कि पुलिस विभाग इस दिशा में मुस्तैद है और मामलों की नियमित मॉनिटरिंग के लिए विशेष समितियों का गठन किया गया है जो समयबद्ध अनुपालन की निगरानी कर रही हैं।

किस मामले में डीजीपी को किया गया था तलब?

दरअसल, यह पूरा मामला हत्या के संगीन आरोपों में जेल में बंद आरोपी पुष्पराज सिंह उर्फ ​​बबलू की जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान उपजा था। पिछले महीने जब जस्टिस समीर जैन की पीठ के समक्ष इस जमानत अर्जी पर सुनवाई हो रही थी, तब संबंधित पुलिस अधिकारियों ने बार-बार दिए गए न्यायिक आदेशों के बावजूद आवश्यक रिकॉर्ड्स और स्पष्ट निर्देश पेश करने में घोर लापरवाही और हीलाहवाली दिखाई थी। पुलिस के इस ढुलमुल और गैर-जिम्मेदाराना रवैये पर कड़ा संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने डीजीपी को व्यक्तिगत रूप से तलब कर स्पष्टीकरण मांगा था कि अदालती आदेशों के प्रति पुलिसकर्मियों में यह 'अनिच्छा' और उपेक्षा का भाव क्यों पनप रहा है। हाईकोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब राज्य के पुलिस महकमे में जवाबदेही और जांच की गुणवत्ता सुधारने को लेकर हलचल तेज हो गई है।