4000 साल पुरानी अद्भुत छपाई कला जो सरहद पार कर पहुंची राजस्थान के थार मरुस्थल; जानिए दुनिया भर में अजरख प्रिंट का इतिहास

4000 साल पुरानी अद्भुत छपाई कला जो सरहद पार कर पहुंची राजस्थान के थार मरुस्थल; जानिए दुनिया भर में अजरख प्रिंट का इतिहास

दुनिया के वस्त्र इतिहास और पारंपरिक हस्तशिल्प की जब भी बात होती है, तो कुछ ऐसी कलाएं सामने आती हैं जो सदियों का सफर तय करके आज भी अपनी चमक बनाए हुए हैं। ऐसी ही एक अनूठी और चमत्कारी छपाई की कला है 'अजरख प्रिंट', जिसका इतिहास आज का नहीं बल्कि करीब चार हजार साल पुराना है। इस प्राचीन कला के साक्ष्य और अवशेष हमें सीधे तौर पर सिंधु घाटी सभ्यता के पुरातात्विक उत्खनन से जुड़े स्थलों से मिलते हैं। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि मोहनजोदड़ो की ऐतिहासिक खुदाई के दौरान एक मूर्ति मिली थी जिसके कंधों पर जो शॉल या चादर पड़ी हुई थी, उस पर त्रिफोलियो (Trefoil) डिजाइन और ज्यामितीय पैटर्न उकेरे गए थे, जो आज के आधुनिक अजरख प्रिंट से हूबहू मेल खाते हैं। इस बात से यह साफ हो जाता है कि यह कला इंसानी सभ्यता के शुरुआती दौर से ही कपड़ा बुनाई और रंगाई की दुनिया में अपनी गहरी जड़ें जमा चुकी थी। सिंध क्षेत्र से शुरू हुआ यह सफर सदियों का रास्ता तय करते हुए सरहद पार कर भारत के कच्छ और राजस्थान के रेगिस्तानी अंचलों तक आ पहुंचा, जहाँ के कारीगरों ने इसे अपनी मेहनत और साधना से जीवित रखा।

कैसे पड़ा इस अनूठी कला का नाम 'अजरख' और क्या है इसके पीछे की दिलचस्प लोककथा

'अजरख' शब्द की उत्पत्ति और इसके नामकरण के पीछे भी कई दिलचस्प कहानियां और ऐतिहासिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। एक लोकप्रिय मान्यता के अनुसार, अरबी भाषा में 'अज्रक' शब्द का अर्थ 'नीला' होता है, क्योंकि इस पूरी छपाई और रंगाई की प्रक्रिया में नील के रंग यानी इंडिगो की भूमिका सबसे मुख्य होती है। वहीं दूसरी स्थानीय किवंदती यह भी कहती है कि जब इस कला के एक कारीगर ने पहली बार इस जटिल और सुंदर कपड़े को तैयार करके अपने राजा या उस्ताद को दिखाया, तो उन्होंने इसे देखकर कहा था 'आज रख', जिसका मतलब होता है कि इस अद्भुत कला को संभाल कर आज ही रख लो। समय बीतने के साथ यह नाम 'अजरख' के रूप में प्रसिद्ध हो गया। यह कला केवल कपड़ों पर की जाने वाली कोई साधारण छपाई नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से चली आ रही एक ऐसी साधना है जिसमें रेगिस्तान की मिट्टी, पानी के रासायनिक गुण, प्राकृतिक जड़ी-बूटियां और कारीगरों की उंगलियों का हुनर आपस में इस तरह घुल-मिल जाता है कि कपड़ा देखते ही बनता है।

सरहद पार कर राजस्थान के रेगिस्तान तक पहुंची कला और बाड़मेर का अजरख प्रिंट

सिंधु घाटी और पाकिस्तान के सिंध प्रांत से ताल्लुक रखने वाली यह कला समय के साथ सरहद पार कर भारत के गुजरात के कच्छ और राजस्थान के पश्चिमी छोर पर बसे बाड़मेर जिले तक पहुंच गई। बाड़मेर के बलोतरा और आसपास के इलाकों में खत्री समुदाय के लोगों ने इस कला को अपने सीने से लगाकर इस तरह सहेजा कि आज यह पूरी दुनिया में 'बाड़मेर के अजरख प्रिंट' के नाम से अपनी एक अलग पहचान बना चुका है। राजस्थान के इस गर्म और शुष्क रेगिस्तानी इलाके में पानी की कमी और चिलचिलाती धूप के बावजूद कारीगरों ने अपनी मेहनत से इस छपाई को जीवित रखा। चूंकि इस छपाई में प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल होता है, इसलिए यहाँ की मिट्टी और पानी की प्राकृतिक प्रकृति इन रंगों को और अधिक पक्का तथा चमकदार बना देती है। सरहद के दोनों तरफ भले ही राजनीतिक दीवारें खींच दी गई हों, लेकिन अजरख की यह प्राचीन सांस्कृतिक विरासत आज भी दोनों देशों के साझा इतिहास और कला प्रेम की एक सुंदर और जीवंत मिसाल पेश करती है।

सोलह चरणों की बेहद जटिल प्रक्रिया, जिसमें प्रकृति के तत्वों का होता है अनोखा इस्तेमाल

अजरख प्रिंट को तैयार करना कोई आसान काम नहीं है, बल्कि यह सोलह चरणों से गुजरने वाली एक बेहद लंबी, कठिन और धैर्य की परीक्षा लेने वाली प्रक्रिया है। इस पूरी छपाई में किसी भी तरह के कृत्रिम या रासायनिक (Chemical) रंगों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है, बल्कि पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से इको-फ्रेंडली और प्राकृतिक होती है। सबसे पहले कच्चे कपड़े (कॉटन या सिल्क) को ऊंट की लीद, अरंडी के तेल और सोडा मिलाकर कई दिनों तक पानी में भिगोकर रखा जाता है ताकि कपड़े के रेशे नरम हो जाएं और रंग को अच्छी तरह सोख सकें। इसके बाद हरड़ के घोल में कपड़े की रंगाई की जाती है। डिजाइन उकेरने के लिए लकड़ी के हाथ से तराशे गए जटिल ठप्पों (Wooden Blocks) का प्रयोग किया जाता है। कपड़े पर बार-बार छपाई करके, उसे लोहे के जंग, फिटकरी, मूंठ और प्राकृतिक इंडिगो (नील) तथा लाल रंग के घोल में बार-बार डुबोया जाता है। हर एक रंग को चढ़ाने के बाद कपड़े को धूप में सुखाने और धोने की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जिसमें कई हफ्तों का समय लग जाता है।

आधुनिक फैशन की दुनिया में अजरख का जलवा और इस विरासत को बचाने की चुनौती

आज के इस आधुनिक और मशीनी युग में जहाँ हर चीज कारखानों में सेकंडों में तैयार हो जाती है, वहाँ हाथ से बनने वाले अजरख प्रिंट की कीमत और उसका महत्व और अधिक बढ़ गया है। देश-विदेश के बड़े-बड़े फैशन डिजाइनर और पारंपरिक वस्त्रों के पारखी आज अपने विंटर और समर कलेक्शंस में अजरख प्रिंट से बने साड़ियों, कुर्तो, दुपट्टों और शाॅलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। प्राकृतिक रंगों की महक और इसकी अनूठी ज्यामितीय डिजाइनिंग आधुनिक युवाओं को भी अपनी ओर आकर्षित कर रही है। हालांकि, इस शानदार विरासत के सामने आज भी कुछ बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं। इस कला को सीखने और करने में बहुत अधिक शारीरिक श्रम, धैर्य और समय की आवश्यकता होती है, जिसके चलते नई पीढ़ी के युवा इस पारंपरिक पेशे से दूर होते जा रहे हैं। इसके अलावा बाजार में मिलने वाले सस्ते सिंथेटिक और नकली 'अजरख' प्रिंट भी असली कारीगरों के व्यापार को नुकसान पहुंचाते हैं। जरूरत इस बात की है कि इस चार हजार साल पुरानी थाती को सरकारी संरक्षण मिले और सही मायनों में उन हुनरमंद कारीगरों को उनका हक और उचित दाम मिले जो रेगिस्तान की धूप में बैठकर इस कला को अपनी सांसों में संजोए हुए हैं।