गूगल को यूज करना पड़ सकता है महंगा, यूरोप ने अमेरिकी 'बिग टेक' पर नकेल कसने का बना लिया है मास्टरप्लान

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News India Live, Digital Desk: पिछले कुछ दशकों से अमेरिका की कुछ बड़ी टेक कंपनियाँ जैसे गूगल (Google), फेसबुक (अब मेटा) और अमेज़ॅन (Amazon) पूरी दुनिया के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर हावी हो गई हैं। अगर आपको किसी को मैसेज भेजना है तो आपको वॉट्सऐप चाहिए, अगर आपको कुछ सर्च करना है तो गूगल चाहिए, और अगर कुछ खरीदना है तो अमेज़ॅन।

लेकिन अब यूरोपीय यूनियन (European Union) ने इस 'तकनीकी निर्भरता' को खत्म करने की ठान ली है। यूरोप एक नया शब्द, 'डिजिटल संप्रभुता' (Digital Sovereignty), इस्तेमाल कर रहा है और अमेरिकी बिग टेक कंपनियों के 'साम्राज्य' को चुनौती देने की तैयारी में है।

क्या है 'डिजिटल संप्रभुता'? (आसान भाषा में)

सीधी भाषा में डिजिटल संप्रभुता का मतलब है कि एक देश (या ब्लॉक, जैसे कि यूरोपियन यूनियन) अपनी टेक्नोलॉजी, अपना डेटा और अपने साइबर स्पेस को नियंत्रित करने की पूरी ताकत रखता हो। इसका अर्थ यह हुआ कि:

  1. यूरोपीय टेक्नोलॉजी का विकास: यूरोप उन तकनीक, सॉफ्टवेयर और चिप्स पर काम करेगा जो उसने खुद बनाए हैं, ताकि उसे बाहरी कंपनियों पर निर्भर न रहना पड़े।
  2. यूरोपीय नियम सबसे ऊपर: विदेशी टेक कंपनियाँ अगर यूरोप में काम करना चाहती हैं, तो उन्हें बिना किसी किंतु-परंतु के यूरोपीय नियमों का पालन करना होगा।

यूरोप को अमेरिकी टेक से इतना डर क्यों?

यह डर सिर्फ व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा का नहीं है, बल्कि सुरक्षा और प्राइवेसी से जुड़ा है।

  • आर्थिक नियंत्रण: जब सभी ज़रूरी प्लेटफॉर्म (सर्च इंजन से लेकर क्लाउड सर्विस तक) विदेशी कंपनियों के पास होते हैं, तो वे अर्थव्यवस्था को भी नियंत्रित करने लगते हैं, और यूरोपीय कंपनियाँ पिछड़ जाती हैं।
  • राजनीतिक दखल: चुनाव या अन्य राजनीतिक मुद्दों के समय विदेशी कंपनियों का सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बड़ा नियंत्रण होता है, जो लोकतंत्र को प्रभावित कर सकता है।

यूरोप का 'मास्टर प्लान': AI और चिप्स पर ज़ोर

यूरोपीय यूनियन इस दिशा में बहुत बड़े कदम उठा रहा है।

  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कानून: यूरोप ने दुनिया के सबसे सख़्त AI कानून पास किए हैं, ताकि बड़ी AI तकनीक पूरी तरह से उनके नियमों के अनुसार ही काम करें।
  • डिजिटल मार्केट्स एक्ट (DMA): इस कानून ने गूगल और मेटा जैसी कंपनियों पर कठोर नियम लगाए हैं, ताकि वे अपनी मार्केट पावर का गलत इस्तेमाल न कर सकें।

यूरोप का यह कदम केवल डेटा प्राइवेसी तक सीमित नहीं है। यह आने वाले समय की लड़ाई है तकनीक पर संप्रभुता की लड़ाई। अगर यूरोप इसमें सफल होता है, तो बाकी दुनिया भी, जिसमें भारत शामिल है, अपने 'डिजिटल साम्राज्य' को सुरक्षित करने की प्रेरणा ले सकता है।