UP SIR Campaign : जिनके पिता की मृत्यु 2003 से पहले हुई, उनके बच्चे नहीं बन पा रहे वोटर! जानें क्या है निर्वाचन आयोग का पेच
News India Live, Digital Desk : यूपी में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) अभियान में एक अजीबोगरीब समस्या ने प्रशासन के पसीने छुड़ा दिए हैं। प्रदेश के हजारों युवा, जो पहली बार वोट डालने की उम्र (18+) पार कर चुके हैं, मतदाता सूची में अपना नाम शामिल नहीं करवा पा रहे हैं। इसका कारण यह है कि उनके पास अपने पिता का ऐसा कोई डिजिटल रिकॉर्ड या प्रमाण पत्र नहीं है जो चुनावी सॉफ्टवेयर (E-Roll) की शर्तों को पूरा कर सके।
क्या है मुख्य समस्या? (The 2003 Deadline)
निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार, नए मतदाता के पंजीकरण के लिए परिवार के किसी सदस्य (अधिमानतः पिता) का मतदाता पहचान पत्र या वैध मृत्यु प्रमाण पत्र अनिवार्य होता है।
डिजिटल रिकॉर्ड का अभाव: उत्तर प्रदेश में जन्म और मृत्यु के पंजीकरण का डिजिटलीकरण मुख्य रूप से 2003 के बाद प्रभावी हुआ।
सॉफ्टवेयर रिजेक्शन: जिन युवाओं के पिता की मृत्यु 2003 से पहले हुई थी, उनके पास अक्सर हाथ से बने (Manual) मृत्यु प्रमाण पत्र हैं या वे पूरी तरह गायब हैं। जब बीएलओ (BLO) या डेटा ऑपरेटर सॉफ्टवेयर में विवरण डालते हैं, तो पुराने रिकॉर्ड मैच न होने के कारण फॉर्म रिजेक्ट हो जा रहे हैं।
इन जिलों में सबसे ज्यादा असर
यह समस्या ग्रामीण इलाकों और पुराने शहरों में अधिक देखी जा रही है जहाँ रिकॉर्ड कीपिंग (Record Keeping) पहले से ही कमजोर थी। लखनऊ, कानपुर और प्रयागराज जैसे जिलों के निर्वाचन कार्यालयों में ऐसे सैकड़ों शिकायतें पहुँच रही हैं।
SIR (Special Intensive Revision) क्या है?
यह चुनाव आयोग का एक विशेष अभियान है जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को 100% शुद्ध करना है। इसमें:
नए मतदाताओं के नाम जोड़े जा रहे हैं।
मृतकों और शिफ्ट हो चुके लोगों के नाम हटाए जा रहे हैं।
फर्जी और डुप्लीकेट वोटर्स की छंटनी की जा रही है।
प्रशासन का क्या है कहना?
सूत्रों के अनुसार, निर्वाचन अधिकारी अब इस समस्या का समाधान निकालने के लिए 'वैकल्पिक दस्तावेजों' पर विचार कर रहे हैं। यदि पिता का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, तो माँ के दस्तावेज, स्कूल लिविंग सर्टिफिकेट (SLC) या ग्राम प्रधान/पार्षद द्वारा सत्यापित हलफनामे (Affidavit) को आधार बनाया जा सकता है।