बिहार में अनोखा चमत्का 9 महीने की नौकरी पर मिला 5 साल के अनुभव का रिवॉर्ड
News India Live, Digital Desk: कहते हैं कि एक-एक नंबर के लिए छात्र रातों की नींद और चैन गँवा देते हैं। लेकिन सोचिए अगर किसी भर्ती प्रक्रिया में किसी उम्मीदवार को महज 9 महीने के काम के बदले 5 साल के अनुभव वाले पूरे अंक दे दिए जाएँ? सुनने में यह किसी फ़िल्मी कहानी जैसा लगता है, लेकिन बिहार के सहायक प्रोफेसर भर्ती (Bihar Assistant Professor Recruitment) के उम्मीदवारों के बीच आजकल इसी बात का दुखड़ा है।
गड़बड़ी क्या है, सरल शब्दों में समझिये
आमतौर पर असिस्टेंट प्रोफेसर बनने की दौड़ में ‘अनुभव’ यानी टीचिंग एक्सपीरियंस के अपने नंबर होते हैं। नियम साफ़ है—जितने साल पढ़ाया, उसी के हिसाब से आपके मार्क्स बढ़ेंगे। लेकिन आयोग के डेटा और हालिया अपडेट के अनुसार, कुछ उम्मीदवारों के मामले में अंकों का ऐसा 'अजीबो-ग़रीब' खेल सामने आया है जहाँ उनके कार्यकाल की गणना में भारी अंतर है। जिनके पास कागजों पर महज़ 9 महीने का अनुभव (9 months experience) था, उन्हें स्क्रूटनी में सीधे 5 साल का फायदा (points for 5 years) दे दिया गया।
अब आप खुद सोचिये, इस गड़बड़ी की वजह से वे छात्र जो कई सालों से पढ़ा रहे हैं और मेरिट का इंतज़ार कर रहे हैं, वे रेस में पिछड़ सकते हैं। आखिर अंकों का यह अंतर किसी भी अभ्यर्थी के भविष्य को बना या बिगाड़ सकता है।
छात्रों के बीच बढ़ती मायूसी
इस खबर के बाहर आने के बाद से उन युवाओं में काफी गुस्सा और निराशा है जो पूरी ईमानदारी से तैयारी कर रहे थे। उनका सवाल बहुत वाजिब है— "जब हम हर डॉक्यूमेंट और एक्सपीरियंस लेटर के लिए एड़ियां रगड़ रहे हैं, तो कुछ लोगों के साथ यह मेहरबानी कैसे हुई?"
बिहार की शिक्षा प्रणाली और नियुक्तियों में पारदर्शिता (Transparency) हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है। उम्मीदवारों का मानना है कि अगर बीएसयूएससी (BSUSC) ने समय रहते इसे दुरुस्त नहीं किया, तो पूरी चयन प्रक्रिया के निष्पक्ष होने पर लोग उंगली उठाएंगे।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल इस गड़बड़ी के उजागर होने के बाद आयोग से जवाब मांगा जा रहा है। मेधावी छात्र उम्मीद कर रहे हैं कि इसे महज 'मानवीय भूल' या 'टाइपिंग एरर' मानकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जाएगा। असिस्टेंट प्रोफेसर जैसा पद सीधे-सीधे हज़ारों छात्रों के भविष्य से जुड़ा होता है, ऐसे में भर्ती की गरिमा को बनाए रखना सबसे ज़्यादा जरूरी है।
क्या आयोग इन गलतियों को सुधार कर नई लिस्ट जारी करेगा? या फिर यह भर्ती भी लंबी कानूनी लड़ाई में फंस जाएगी? इसका जवाब तो आने वाला वक्त ही देगा, लेकिन इतना साफ़ है कि बिहार के नौजवानों को अभी संघर्ष करना बाकी है।