बंगाल की राजनीति का यू-टर्न वामपंथ के पतन के बाद कैसे TMC और BJP के बीच धर्म बना सबसे बड़ा हथियार
News India Live, Digital Desk: पश्चिम बंगाल, जिसे कभी 'लाल दुर्ग' कहा जाता था और जहाँ राजनीति केवल आर्थिक नीतियों और वर्ग संघर्ष पर आधारित थी, आज वहां की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। Zee News की रिपोर्ट के अनुसार, 2011 में वामपंथ के अंत के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच की जंग अब धार्मिक ध्रुवीकरण पर टिकी है।
1. वामपंथी शासन: जब धर्म 'निजी' विषय था
34 साल के वामपंथी शासन (1977-2011) के दौरान, बंगाल की राजनीति में धर्म को सार्वजनिक मंच से दूर रखा गया था।
धर्मनिरपेक्षता का ढांचा: माकपा (CPIM) के समय में दुर्गा पूजा या ईद जैसे त्योहारों में राजनीतिक भागीदारी सीमित थी।
वर्ग बनाम वर्ण: उस समय राजनीति का केंद्र किसान, मजदूर और मध्यम वर्ग की आर्थिक समस्याएं थीं, न कि उनकी धार्मिक पहचान।
2. ममता बनर्जी और 'सॉफ्ट हिंदुत्व' बनाम 'अल्पसंख्यक तुष्टीकरण'
2011 में सत्ता में आने के बाद, ममता बनर्जी ने अपनी रणनीति बदली:
शुरुआती दौर: उन पर अक्सर 'इमाम भत्ता' और मुस्लिम वोट बैंक को साधने के आरोप लगे, जिसे विपक्ष ने 'अल्पसंख्यक तुष्टीकरण' का नाम दिया।
रणनीति में बदलाव: 2019 के लोकसभा चुनाव में BJP के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए TMC ने अपना रुख बदला। अब ममता बनर्जी सार्वजनिक मंचों पर 'चंडी पाठ' करती हैं और उनकी सरकार ने दुर्गा पूजा समितियों के लिए सरकारी अनुदान बढ़ाकर 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की राह पकड़ ली है।
3. BJP का उदय और 'जय श्री राम' का नारा
पश्चिम बंगाल में BJP की एंट्री ने राज्य की राजनीतिक भाषा को पूरी तरह बदल दिया:
धार्मिक ध्रुवीकरण: BJP ने 'जय श्री राम' के नारे को एक राजनीतिक पहचान बनाया और TMC पर हिंदू विरोधी होने का आरोप लगाया।
मतुआ समुदाय: BJP ने मतुआ जैसे दलित हिंदू समुदायों को साधने के लिए CAA और धार्मिक कार्ड का प्रभावी ढंग से उपयोग किया।
4. क्यों हुआ यह बदलाव?
विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे कई सामाजिक और राजनीतिक कारण हैं:
विपक्ष का खाली स्थान: कांग्रेस और वामपंथ के कमजोर होने से पैदा हुई शून्यता को BJP ने अपनी धार्मिक विचारधारा से भरा।
पहचान की राजनीति: बंगाल के लोग अब अपनी पहचान (Identity) को लेकर अधिक मुखर हुए हैं, जिसे राजनीतिक दलों ने वोट बैंक में बदल दिया।